शनिवार, 1 जनवरी 2011

शाकाहारी संस्कृति का संरक्षण ही हमारी सुरक्षा है।

पुरातन सुसभ्य भारतीय संस्कृति पर निरन्तर पश्चिमि और मध्य पश्चिमि संस्कृतियों का अब वैचारिक आकृमण हो रहा है। यह कुसंस्कृतियाँ हमारी विकसित और सुसंस्कृत सभ्यता को पुरातन कहकर नष्ट भ्रष्ट करने पर आमदा है। असभ्य, कबीलाई और जंगली माहोल में पनपी यह कुसंस्कृतियां, सैंकडों बरसों से, सभ्यता के शीर्ष पर स्थापित हमारी संस्कृति को, भोगवाद और भौतिक चकाचौध के प्रलोभन देकर पुनः जंगली बनाने को आतुर है।

समानता साम्यता और यक्सां के नाम पर हीन व पतन के स्तर पर उतारनें को उतारू यह संस्कृतियाँ, अपनी संस्कृतियों में भी शान्ति, भाईचारा, प्रेम के उपदेश बताकर भ्रमित करती रहती है। किन्तु ये सब गुण जिस महागुण के बायप्रॉडक्ट है, वह है अहिंसा!! अहिंसा भी समस्त जीव-मात्र के लिये।

अहिंसा व जीवदया भारत की पवित्र भूमि का सात्विक उत्कृष्ट और विलक्षण सिद्धान्त है। भारतीय धर्म-दर्शनों ने मांस मदिरा जुआ परनारीसेवन आदि को दुर्गुणी के व्यसन कहकर सदैव धिक्कारा है। मांसभक्षण को स्वीकार्य मानने वाले वे पर-दर्शन सम्प्रदाय, हमारे अहिंसा के सिद्धांत के समक्ष टिकना तो दूर दृष्टि मिलाने में सक्षम नहीं है। और तो और स्वयं को धर्म के नाम पर मांसभक्षण से इस कदर जोडे हुए है कि चाह कर भी सभ्यता उन्मुख नहीं हो सकते। अतः शाकाहार शैली सभ्य-सात्विक संस्कृति का श्रेष्ठ पर्याय है। मांसाहारी शैली से समानता दर्शाने के कुटिल प्रयत्न धराशायी होंगे। सात्विकता उनके सभी कुटिल प्रलोभनों की अमोघ काट है, सात्विकता है हमारी  संस्कृति में व्याप्त ‘अहिंसा’ व 'जीवदया'।

दया-करूणा के इन सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्तों से रति भर समानता करने का उनका सामर्थ्य नहीं है। जीव हिंसा की बात आते ही वे संम्वेदनहीन कुसंस्कृतियां हथियार डालनें को विवश हो जाती है। अहिंसा हमारी सभ्य सुसंस्कृति का अनमोल सार तत्व है, जिसका सीधा सम्बंध शाकाहार से है। सत्विकता से है। यह अहिंसा भाव ही हमें दया-करूणा पर आस्थावान रखता है। परिणाम स्वरूप क्रोध, अशान्ति, प्रतिशोध, लड़ाई व अराजकता से हमें दूर रखता है। अहिंसक समाज की रचना के लिये दया करूणा युक्त संवेदनाओं को संरक्षण देना आवश्यक है। निश्चित ही विश्वगुरू भारत अपनी विशिष्ठ धरोहर, शाकाहार के पारंपरिक जीवनमूल्यों से अपनी विशिष्ठ संस्कृति की रक्षा में समर्थ है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. पानी का मोल पहचानिए
    इस बारे में अपने विचार अवश्य बताएं

    "These days, there is lot of talk happening that if people would stop eating meat then the water reservoirs will work for a longer time and the amount of water which is used to rare one animal, that water is sufficient to grow crops for at least 500 people; whereas with that one animal, you may feed only 20 people. ...."

    http://www.gurumaa.com/spiritual-question-answers/is-being-vegetarian-good-or-bad.html

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  2. सोचता हूँ एक लेख बनाऊंगा किसी दिन ........ओरिजिनल साइंस की तस्वीर दिखानी तो पड़ेगी ना :)

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  3. प्राकृतिक संतुलन के लिए हम सबको समझना ही होगा......

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  4. सही कहा सुज्ञ जी! अहिंसा, करुणा, मन वचन कर्म की शुचिता तो चाहिए ही| जहाँ यह सब हों, शाकाहार पीछे कैसे रह सकता है भला!

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  5. जीवदया हमारी जगत कल्याण भावना की संस्कृति का विलक्षण सिद्धांत है।

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