मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

माँसाहार से ग्लोबल वॉर्मिंग


क्या आप नॉन-वेज खाते हैं?

अगर हां, तो क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करके आप ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ा रहे हैं? यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। हमारी टेबल पर सजा लज़ीज़ मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है।

फूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के अनुसार पशुपालन क्षेत्र ग्लोबल ग्रीन हाउस गैसों में 18 प्रतिशत का योगदान करता है जो कि परिवहन क्षेत्र से अधिक है। पशुपालन के कारण ग्लोबल टेम्प्रेचर भी बढ़ा है। असल में दुनिया भर में चरागाह और पशु आहार की खेती के लिए वनों को काटा जा रहा है। एफएओ के अनुसार लैटिन अमेरिका में 70 प्रतिशत वन भूमि को चरागाह में बदल दिया गया है। पेड़- पौधे कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक होते हैं। पेड़ों के कम होने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है जिसके कारण तापमान में भी बढ़ोतरी होती है। ऐनिमल वेस्टेज से नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस निकलती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना जहरीली है। गौ पालन के कारण मिथेन का उत्पादन होता है, जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में तेइस गुना खतरनाक है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में बीफ का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

कोपनहेगन सम्मेलन में साफ हो गया कि कार्बन इमिशन में कटौती पर कानूनी बाध्यताओं को स्वीकार करना फिलहाल संभव नहीं है। यह भी तय हो गया कि इमिशन में स्वैच्छिक कटौती तब तक संभव नहीं होगी जब तक कि जन-जन इसके लिए प्रयास न करे। इस दिशा में मांसाहार में कटौती एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के अन्य उपायों की तुलना में यह सबसे आसान है। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
(रमेश कुमार दुबे के आलेख का अंश)

11 टिप्‍पणियां:

  1. A recent United Nations report concluded that a global shift toward a vegan diet is necessary to combat the worst effects of climate change. Senior U.N. Food and Agriculture Organization official Henning Steinfeld reported that the meat industry is "one of the most significant contributors to today's most serious environmental problems." The official handbook for Live Earth, the anti-global warming concerts that Al Gore helped organize, says that not eating meat is the 'single most effective thing you can do' to reduce your climate change impact.

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  2. A German study conducted in 2008 concluded that a meat-eater's diet is responsible for more than seven times as much greenhouse gas emissions as a vegan's diet.

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  3. Rajendra Pachauri, the head of the U.N.'s Nobel Prize–winning Intergovernmental Panel on Climate Change (and a vegetarian himself), urges people to "please eat less meat—meat is a very carbon-intensive commodity."

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  4. धन्यवाद ग्लोबल जी,

    इस नई जानकारी के लिये

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  5. अच्छा लगा लेख :)
    आभार आपका

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  6. लोग लाशो को जमीन में दबा देते है

    या जला देते है

    परन्तु ये अपने शरीर में भर लेना अमीर उच्चे लोगो की शोभा है

    बहुत अच्छा लेख

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  7. काश, भारत के सभी मांसाहारी यदि निरामिष हो जायें तो जलवायु प्रदूषण तेज़ी से होने से बच जाये.

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  8. माँस पाने के लिए जानवरों का पालन पोषण देखरेख और माँस का प्रसंस्करण करना एक लम्बी व जटिल प्रक्रिया है। पृथ्वी-पर्यावरण को विशाल क्षति पहुचाने में इस उद्योग का मुख्य हाथ है। आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए, उत्पादन से भी अनेकगुना जमीन और संसाधनों का अपव्यय होता है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में झोक दी गई है।
    मांसाहार में वनस्पति आदि प्राकृतिक संसाधनो का अनेक गुना अधिक उपभोग होता है। एक तो हम सीधे शाकाहार से ही आवश्यक उर्ज़ा प्राप्त करते है, वहीं मांस प्राप्त करने के लिए लगभग 16 गुना अनाज पशु को खिला देना पडता है और तब जाकर 1 किलो माँस का प्रबंध हो पाता है।
    जबरदस्ती फीड कर पशु का वज़न तो बढ़ा दिया जाता है पर अधिकांश मात्रा में पशुअंग व्यर्थ किए जाते है नतीज़ा उर्जाचक्र में उर्जा का भारी अपव्यय। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही माँस के लिए 10,000 लीटर पानी व्यय होता है।

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  9. उल्लेखनीय है कि औसतन एक अमेरिकी प्रतिवर्ष 125 किलोग्राम मांस का सेवन करता है, चीनी 70 किलोग्राम और भारतीय मात्र 3.5 किलोग्राम। इससे पता चलता है कि मांस उत्पादन के लिए हर साल दुनिया भर में साढ़े पांच हजार करोड़ पशुओं का संहार कर दिया जाता है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी पर जितने मनुष्य रहते हैं, उससे दस गुना अधिक जानवरों का हर साल वध कर दिया जाता है।

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