रविवार, 15 मई 2011

शाकाहार, श्रेष्ठता शुद्धता और पवित्रता का दंभ नहीं, हिंसात्याग के संघर्षशील पुरूषार्थ का आत्मगौरव है।

सजग रहकर हिंसा से बचना आत्मागौरव है। जैसे देशभक्त होना गौरव का विषय है, तुच्छ व्यवहार से दूर रहना स्वाभिमान है। झूठ को त्यागना आत्मगर्व की बात है वैसे ही हिंसा को प्रोत्साहन देने से भरसक दूर रहना, अपनी आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ती के लिए भी हिंसा से बचना, हिंसा को कम करने के उपायों पर सजगता और संघर्ष से डटे रहना और इन्ही उद्देश्यों से सात्विक शाकाहार अपनाना निश्चित ही आत्मगौरव की बात है।

यह श्रेष्ठता का दंभ नहीं है, वस्तुत: सात्विक आहारी कभी भी माँसाहारियों (व्यक्तियों) को हेय या अपराधी की दृष्टि से नहीं देखता। बल्कि वह माँस की उत्पत्ति को हिंसा उपार्जित मानता है उसका सारा खेद हिंसा के प्रति होता है। अब क्योंकि माँस अपने आप में स्वयंमेव हेय है वह हिंसक कृत्य की ही उपज है हिंसाजनित पदार्थ को शाक के समकक्ष सम्मान कैसे मिल सकता है? आपके सामने मांसाहारी और शाकाहारी दोनो पदार्थ लाए जाय तो किस पदार्थ को देखकर आपको जगुप्सा उत्पन्न होगी? निसंदेह वे माँस के टुकडे होंगे। किसी प्राणी की काया और अंगो के टुकडे!! देखने में हुबहु हमारे शरीर के अंश समान!! माँस जो हिंसक कृत्य से ही प्राप्त होता है और हिंसा घृणित आचार है इसलिए हिंसा के प्रति घृणा को विपरित आहारी व्यक्ति विशेष की नफ़रत का आरोप लगाकर भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए। कोई भी शाकाहारी अगर मन से सात्विक है, मनोवृति करूणा प्रधान हो रही है, जब प्रत्येक जीवन के प्रति अनुकम्पा है तो वह दूसरे मनुष्य से घृणा नहीं कर सकता। उसके वचनो में प्रवर्तमान क्षोभ व घृणा निश्चित रूप से हिंसा से है।

माँसाहार शैली अपवित्र कर्म इसलिए भी माना गया है कि पेटपूर्ती के लिए पर्याप्त शाकाहार उपलब्ध होते हुए भी वे लोग स्वादलोलुपता के कारण हिंसक आचारण अपनाते है और उसे समर्थन भी देते है। शाकाहार, विकृति से संस्कृति की ओर मानव का जीवन उत्थान है इसिलिए इसे शुद्धता और पवित्रता की महत्ता प्राप्त है। अहिंसा व करूणा को प्रोत्साहन देने वाली संस्कृति को भला क्यों न शुद्ध व पवित्र माना जाय?

यहाँ किसी भी तरह के पक्षपात अथवा उँच नीच का प्रश्न ही नहीं उठता। दोनो आहारों, शाकाहार व माँसाहार की मात्र आहारपरक समानता निरा भ्रम है। किंचित भी न्यायसंगत नहीं है, मांसाहार, मासांहारियों के लिये मात्र आहार हो सकता है, मगर एक शाकाहारी की दृष्टि में यह निष्प्रयोजन हिंसा से प्राप्त अनावश्यक आहार है, जो एक दुष्कृत्य है। सम्यक् विवेचन, न्यायसंगत तुलना का विवेक जरूरी है। परिहार्य विकल्प के उपलब्ध रहते मात्र 'आहार स्वतंत्रता' और 'स्वादलोलुप मानसिकता' को प्रशय देना मूर्खता ही नहीं 'मनोविकृति' है। यह मानसिकता पतनोमुख गुनाह है। अपराध से दूरी आत्मसंतोष और गौरव का कारण है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. भाई सुज्ञ जी...आपके इस आलेख की जिंतनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी...
    सच ही कहा है आपने कि मांसाहार एक आहार ना होकर एक प्रकार की हिंसा ही है जिसमे केवल जीभ के स्वाद के लिए एक जीव की हत्या कर दी जाती है|
    मैं भी मांसाहार के बिलकुल विरुद्ध हूँ|
    FOOD IS FOR LIVING, NOT FOR ENJOYMENT...

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  2. बिलकुल मै पूरी तरह सहमत हूँ कि शाकाहार विकृति से संस्कृति कि और ले जाता है ............आप यूँ ही भारतीय संकृति को आगे बढ़ाते रहे है |

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  3. नक़्कारखाने की तूती है यह लेख

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  4. काजल कुमार जी जिस दिन श्रीराम सेतु में गिलहरी के प्रयास की कथा को पढ़ जायेंगे तो उस दिन से उन्हें कोई भी लघु प्रयास महत्वहीन नहीं प्रतीत होगा.
    जिसकी जितनी सामर्थ्य .......... वह अपनी शक्ति अनुसार जितना भी करे तो जागरुक ही कहलायेगा.

    हम यदि एक व्यंग्य कार्टून को केवल दो-चार लोगों की मनोरंजन सामग्री कहें तो यह भी सरासर अन्याय होगा.

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  5. शाकाहार, शुद्धता और पवित्रता का दंभ नहीं, हिंसात्याग का सात्विक आत्मगौरव है।

    सही .....बिलकुल सही ...बेहतरीन लेख :)

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  6. काजल जी,

    करूणा जगाने के छोटे छोटे भाव प्रयास, महत्वपूर्ण हृदय परिवर्तन करने में समर्थ होते है। यह नन्ही निरिह जिन्दगियाँ बचाने के शुभ-भाव है। कहीं कभी एक भी जान बचती है तो यह सारे शब्द कुरबान है उस जीवन के लिए।

    हमें तो धैर्य से शुभ-कर्म रत रहना चाहिए। आमूल-चूल परिवर्तन की अपेक्षा रखे बिना। तब कोई भी योगदान निर्थक नहीं जाता।

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  7. बंधुवर आपका ह्रदय से धन्यवाद जो आपने मुझे अपने इस सुन्दर ब्लॉग "निरामिष" पर आमंत्रित किया| मुझे निरामिष से जुड़ने में बेहद ख़ुशी होगी| कृपया मार्गदर्शन करें कि किस प्रकार मैं ऐसा कर सकता हूँ?

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  8. शाकाहार, शुद्धता और पवित्रता का दंभ नहीं, हिंसात्याग का सात्विक आत्मगौरव है।

    यह पंक्ति सब कुछ कहती है...... सुंदर सार्थक लेख आभार....

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  9. 'यहाँ उँच नीच का प्रश्न ही नहीं है।दोनो आहारों की मात्र आहार परक समानता न्यायसंगत नहीं है, मांसाहार, मासांहारियों के लिये मात्र आहार हो सकता है, मगर एक शाकाहारी की दृष्टि में यह निष्प्रयोजन हिंसा से प्राप्त अनावश्यक आहार है, जो शाकाहार के सहज उपलब्ध होते किया जाने वाला दुष्कृत्य है।'

    बहुत ही सुन्दर विवेचना की है सुज्ञ जी आपने.
    सुन्दर लेखन के लिए आभार.
    काजल जी ,हमारे लिए तो सुज्ञ जी की वाणी 'देव वाणी' है.

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  10. दिवस जी,

    कृपया अपना ई-मेल इनबॉक्स देंखे, और वहां आमंत्रण मेल में एक लिंक जो स्वीकृति के लिये है, क्लिक कर दें। आप जुड जाएँगे॥

    आभार!!

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  11. मांसाहार के मूल में हिंसा है। अपने स्वाद या स्वास्थ्य के उद्देश्य से नित नये प्राणी की निर्दयी हत्या का विचार ही दुखद है

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