गुरुवार, 26 मई 2011

भीड़ का अंधानुकरण या सभ्यता का विकास


अक्सर कहा जाता है, विश्व की बहुसंख्य आबादी मांसाहारी है, इसलिए माँसाहारी रहना ही उचित है।


लेकिन…………
  • बहुसंख्य का आचार हमेशा ही आचरणीय नहीं होता।
  • पृथ्वी पर हीरो से कहीं अधिक कंकर है, अधिसंख्या के आधार पर कंकर मूल्यवान नहीं हो जाते।
  • जनसमुदाय में सदाचारियों से अधिक भ्रष्टाचारी है। संख्या बहुमत के कारण, भ्रष्टाचार अनुकरणीय नहीं बन जाता।
  • अच्छे लोगों की तुलना में बुरे लोगों की संख्या सदैव ही अधिक होती है। बुरों की भारी संख्या होने से अनैतिकता कभी भी शुभकर्म में नहीं खप जाती।



आश्चर्य है कि…………

सभ्यता और संस्कार के इस विकास दौर में………

जब मनुष्य नें अपने आवास संस्कारवश इमारतों के लिए गारे मिट्टी चूने सिंमेंट को अपनाया और वृक्षों को जीवन-दान दे दिया।

जब मनुष्य नें अपने याता-यात संस्कार के लिए ईंजिन बनाए और पशुओं को बोझ से मुक्त कर दिया।

फ़िर भी क्यों मानव ने अभी भी अपना आहार सुसंस्कृत नहीं किया? शाकाहार विकल्प के होते हुए भी क्यों मानव सभ्यता से विमुख है?
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     शाकाहार जागृति अभियान




  • 'सभ्यता' और 'संस्कृति' की विकास दर तेज करें।
  • प्रकृति संरक्षण में योगदान दें।
  • पर्यावरण संतुलन में सहयोग दें।
  • करूणा जगाएँ, वसुंधरा मैत्री निभाएँ।

    5 टिप्‍पणियां:

    1. लेख में विचार आपने काफी तार्किक रूप से रखे हैं.... पसंद आये.
      सुज्ञ जी, मन पर एक बोझ है..
      यदि अनजाने में किसी मासूम जीव की ह्त्या हो जाये तब कैसे प्रायश्चित किया जाये?
      क्या उसे ह्त्या कहा जाये? जिस ह्त्या का पक्का पता न हो कि दोषी स्वयं हैं अथवा बराबर वाला, तब क्या ह्त्या के दंड से छूट मिलनी चाहिए?
      क्षमा चाहता हूँ विषयांतर के लिये.

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    2. प्रतुल जी,
      उसे मन का बोझ मानते हुए ग्लानी महसुस करने पर काफी पश्चाताप रूप प्रायश्चित हो जाता है।
      विषयांतर से बचने के लिये विस्तार से मैने आपको मेल किया है।

      आभार!!

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    3. लेख में विचार आपने काफी तार्किक रूप से रखे हैं.... पसंद आये.
      बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....

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    4. हंसराज भाई...बेहद सुलझे हुए शब्दों में की गयी व्याख्या...तर्क की कोई कमी नहीं...साधुवाद...

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