शुक्रवार, 27 मई 2011

यदि अखिल विश्व शाकाहारी हो जाय तो ??

भ्राँतियाँ पैदा करने वाले माँसाहार समर्थक अकसर यह तर्क देते मिलेंगे कि- 'यदि सभी शाकाहारी हो जाय तो सभी के लिए इतना अन्न कहाँ से आएगा?' इस प्रकार भविष्य में खाद्य अभाव का बहाना पैदा कर, वर्तमान में ही सामुहिक पशु-वध और हिंसा को उचित ठहराना तो दिमाग का दिवालियापन है। जबकि सच्चाई तो यह है कि अगर बहुसंख्य भी शाकाहारी हो जाय तो विश्व में अनाज की बहुतायत हो जाएगी।

दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण माँसाहार का बढ़ता प्रचलन है। माँस पाने ले लिए जानवरों का पालन पोषण देखरेख और माँस का प्रसंस्करण करना एक लम्बी व जटिल एवं पृथ्वी-पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाली प्रक्रिया है। एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ भूमि पर जहाँ 8000 कि ग्रा हरा मटर, 24000 कि ग्रा गाजर और 32000 कि ग्रा टमाटर पैदा किए जा सकतें है वहीं उतनी ही जमीन का उपभोग करके, मात्र 200कि ग्रा. माँस पैदा किया जाता है।

आधुनिक पशुपालन में लाखों पशुओं को पाला-पोषा जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस भी ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द, ज्यादा से ज्यादा माँस हासिल किया जा सके। औसत उत्पादन का दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की माँस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है।

एक किलो माँस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन का उपभोग हो जाता है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही माँस के लिए 10,000 लीटर पानी व्यय होता है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए अनेकगुना जमीन और संसाधनों का अपव्यय होता है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में झोक दी गई है। यदि माँस उत्पादन में व्यर्थ हो रहे अनाज, जल और भूमि आदि संसाधनो का सदुपयोग किया जाय तो इस एक ही पृथ्वी पर शाकाहार की बहुतायत हो जाएगी।

एक अमेरिकी अनुसंधान से जो आंकडे प्रकाश में आए है उसके अनुसार अमेरिका में औसतन प्रतिव्यक्ति, प्रतिवर्ष अनाज की खपत 1100 किलो है। जबकि भारत में प्रतिव्यक्ति अनाज की खपत मात्र 150 किलो प्रतिवर्ष है जो कि सामान्य है। किन्तु एक अमेरिकन इतनी विशाल मात्रा में अन्न का उपभोग कैसे कर लेता है? वस्तुत: उसका सीधा आहार तो 150 किलो ही है। किन्तु एक अमेरिकन के 1100 किलो अनाज के उपभोग में, सीधे भोज्य अनाज की मात्रा केवल 62 किलो ही होती है, बाकी का 88 किलो हिस्सा माँस होता है। भारत के सम्दर्भ में कहें तो 150 किलो आहार में यह अनुपात 146.6 किलो अनाज और 3.4 किलो माँस होता है।

एक अमेरिकन की औसतन वार्षिक प्रतिव्यक्ति 1100 किलो अनाज की खपत से वह वास्तव में मात्र 62 किलो अनाज का आहार करता है तो बाकि 1038 किलो अनाज कहाँ जाता है? वह 1038 किलो अनाज जाता है मात्र 88 किलो माँस को प्राप्त करनें में । अर्थात् अपनी वार्षिक 1 किलो प्रोटीन की आवश्यकता के लिए एक आम भारतीय अनुमानित 150 किलो अनाज का उपभोग करता है वहीं इसी आवश्यकता को पूरी करने के लिए एक आम अमेरिकन 1100 किलो अनाज को व्यर्थ कर देता है। कोढ में खाज यह कि बेचारे एक निर्दोष जानवर को बिचोलिया बनाकर अपनी मामूली सी प्रोटीन पूर्ती करता है।

एक विशेष तथ्य पर गौर करें। यदि सभी (25 करोड़) अमेरिकन शाकाहारी हो जाय तो मात्र अमेरिका में ही प्रतिव्यक्ति (1100-150= 950) किलो के हिसाब से प्रतिवर्ष 24 करोड़ टन अनाज की बचत हो जाएगी, जो विश्व मे 170 करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष भरपेट खिलाने को पर्याप्त होगा। यह आंकडे मात्र अमेरिका के संदर्भ में है। यदि समस्त विश्व के बारे में सोचा जाय तो आंकडे कल्पातीत हो जाएँगे। अगले 100 वर्षों तक विश्व को भूखमरी से निजात दिलायी जा सकती है।

स्पष्ट है कि यदि सभी शाकाहारी हो भी जाय तो निश्चित ही पृथ्वी पर अनाज़ की बहुतायत हो जाएगी। इतनी कि शायद भंडारण के लिए भी हमारे संसाधन कम पड़ जाय।

17 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बढ़िया और तार्किक लिखा है! पढ़कर दिल ख़ुश हो गया. इस जानकारीपरक शानदार लेख के लिए आपका आभार!

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  2. wow nice thought
    i wish it gets converted in reality in near future

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  3. सुज्ञ जी,
    आपने अच्छी प्रकार से आंकडें प्रस्तुत कर अपनी बात को सिद्ध किया है.
    सभी को निसंदेह शाकाहार अपनाना चाहिये.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

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  4. आज लोग आँकड़ों की भाषा को ही प्रमाण मानते हैं, विश्वास करते हैं. इस दृष्टि से ये जानकारी बेहद उपयोगी है.
    यदि भारतीय विद्वान् इन आँकड़ों को लेकर अपने उपदेश में देता तो अविश्वसनीयता बनी रहती, लेकिन अमरीकन वैज्ञानिक ने कहा तो जरूर निष्पक्ष कहा होगा... ऎसी मान्यता हो गयी है आज की मॉडर्न फेमलीज़ की.

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  5. आंकड़े लिए शोधपरक और तार्किक लेख..... उम्दा पोस्ट ..आभार

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  6. आंकड़ों के प्रति हमारे पूर्वाग्रह को लेकर कही गयी प्रतुल जी की बात से सहमत हूँ.

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  7. सुज्ञ जी, आपके आंकणे सही हो सकते हैं, पर यह पूरे विश्‍व का शाकाहारी हो पाना किसी भी कीमत पर न सम्‍भव नहीं। क्‍योंकि पूरे विश्‍व को जनता को खिलाने लायक अनाज का उत्‍पादन करने के लिए हमें ऐसी चार और पृथ्वियों की आवश्‍यकता होगी।

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    हंसते रहो भाई, हंसाने वाला आ गया।
    अब क्‍या दोगे प्‍यार की परिभाषा?

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    1. दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण मांसाहार का बढ़ता प्रचलन है। आधुनिक पशुपालन में हजारों पशुओं को पाला जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा मांस हासिल किया जा सके। औसत उत्पादन का दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। यदि माँस उत्पादन में व्यर्थ हो रहे अनाज पानी भूमि आदि संसाधनो का सदुपयोग किया जाय तो तो इस एक पृथ्वी पर शाकाहार की बहुतायत हो जाएगी।

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  8. ज़ाकिर अली साहब, आप तो वैज्ञानिक अभिगम को समर्पित होते हुए भी तथ्यों को स्वीकार नहीं कर रहे? सीधे सादे तथ्य है। जो 13 गुना शाकाहार जानवरों को खिलाया जा रहा है वह इसी पृथ्वी के छोटे से भाग का उत्पादन है। अनाज का उत्‍पादन इतना बचेगा कि इस छोटे ग्रह की अ्तिरिक्त भूमि पुनः पशुओ को वन रूप में लौटा दी जा सकेगी।

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  9. जाकिर अली की टिप्पणी पर जितना हंसा जाए कम है ये बेचारे क्या करें इनकी सोचने की क्षमता बहुत सीमित होती है और मांसाहार कर कर के और कम हो गयी है लेखक ने सारे तथ्यों को इतनी सरलता से समझाया है जो शायद सातवी आठवी के बच्चे को भी समझ में आ जाए पर इन्हें समझ में नहीं आया, खेर ये बात और है की खान पान की आदतों के चलते पूरे विश्व का शाकाहारी होना व्यवहारिक नहीं है, अभी इनके अनवर जमाल मांसाहारी होने के फायदे गिनाने आते ही होंगे.

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  10. ज़ाकिर अली साहब, आपने अपनी जिस पोस्ट का लिंक यहां दिया है, वहां आपकी इसी बात के विरोध में तथ्यपूर्ण जानकारियां अपनी टिप्पणीयों से दे चुका था। जो टिप्पणियां आपने डिलीट कर दी। जबकि वह सौहार्दपूर्ण चर्चा थी। ज़ाकिर अली साहब, यदि निर्मल हितचिंतक भाव से कहुं तो उन पोस्टों से आपने अपनी वैज्ञानिक सुधारवादी छवि को खो दिया है। और एक विचारधारा विशेष को निशाना बनाकर अपनी सौहार्दशील छवि को भी चोट पहुँचाई थी। अपने व्यक्तित्व का इतना बड़ा नुकसान किया एक कुरिति निवारक व्यक्ति नें अनावश्यक कुरिति का तथ्यहीन समर्थन करके!!

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  11. हंसराज भाई मज़ा आ गया आपका यह आलेख पढ़ कर...इन तथ्यों को किसी भी प्रकार नकारा नहीं जा सकता...
    "जानवर चलते फिरते प्रकृति प्रदत्त जीव है, हमारा प्रोटीन बानाने वाली मशीनें नहीं। जानवरों की शक्ति का उपयोग करें, उनके मृत शरीरों का नहीं|"
    यह पंक्ति इस आलेख की सर्वोत्तम पंक्ति लगी...आभार...

    जाकिर अली भाई आपके लिए केवल इतना कहना चाहता हूँ कि शाकाहार के लिए हमें किसी अन्य गृह की कोई आवश्यकता नहीं है...अकेली भारत भूमि ही काफी है पूरे विश्व को अनाज खिलाने के लिए...

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  12. यह आलेख केवल जानकारीपूर्ण ही नहीं बल्कि तथ्यपरक और तर्कसंगत भी है। ज़ाकिर अली का कथन "80 फीसदी लोगों के लिए अन्‍न उगाने के लिए हमें फिलहाल चार और पृथ्वियों की आवश्‍यकता होगी" न केवल भ्रामक है बल्कि असत्य भी है। मांस-उत्पादन के लिये प्रयुक्त होने वाले अनाज का एक अंश यदि इंसानों को मिल सके तो विश्व की भुखमरी की समस्या आसानी से हल हो सकती है। साथ ही मांसाहार के उद्देश्य से जितना वन-विनाश हो रहा है उसमें न केवल फल-फूल-वनस्पति की हानि होती है बल्कि अनेक पशु-पक्षियों का विनाश होकर प्रकृति का संतुलन बिगड रहा है। ज़ाकिर अली के कथन को अनेकों (अनडिस्प्यूटेबल) अंतर्राष्ट्रीय पत्रों और रिपोर्टों में पहले ही असत्य साबित किया जा चुका है।

    सुन्दर आलेख, धन्यवाद!

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  13. बहुतबेहतरीन आलेख ,संक्षिप्त और अर्थ -पूर्ण .गरीबी हठाने का नुश्खा .ईमानदारी से कह सकता हूँ बहुत कम आलेख इतने सीधे पढ़ें हैं जो लघु कलेवर में अपार संभावना छिपाए है. आप का आलेख अप्रतिम है .मुबारक .

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  14. as you are saying so much food is their then why in africa they are dying because of food.
    Currently Indians do not care about what they eating or about nutrition, they just have to concentrate on the daily wage and then eat what they can afford.
    for me i think its not possible or may be very difficult it may become possible if humans will stop the wastage of food, i do not think humans will learn this not to waste the food.
    so its very tough task.
    who will produce so much and how?
    In olden ancient India also rich people ate the Non Veg.

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  15. @ SM,

    हां इसी इथोपीया अफ्रिका आदि की भूखमरी से सीखना चाहिए, जिस अफ्रिका में वे सभी मांसाहारी है, जहां पशुओं की संख्या भी अधिक है फिर भी लोग भूखमरी से त्रस्त है। इसलिए कि शाकाहार उन्हें उपलब्ध नहीं है,उसके उत्पादन के वहां प्रयास ही नहीं है, जो प्राकृत उत्पन्न होता है उन्ही पशुओं का आहार बनता है, अतः मांसाहार निर्भरता ही उनके लिए भूखमरी का कारण बनी।

    भोजन के अपव्यय की बात आपकी सही है, और यही कहा गया है कि मांसाहार प्राप्त करने के लिए अनाज शाक का अपव्यय नहीं होना चाहिए। ऐसा न हो तो वह अनाज हर मुँह तक पहु्चेगा। अपव्यय के बचते ही शाकाहार हरेक के लिए अफॉर्डेबल हो जाएगा।

    यह स्वभाविक नियम है कि उस वस्तु का उत्पादन बढ़ जाता है जिसकी दुनिया में मांग बढ़ती है। पॉलट्री और पशु-पालन के विशाल स्तर पर स्वतः उत्पादन उद्योग लगे है, कारण मांस की मांग यही मांग अगर शाकाहार की होती है तो निश्चित ही विशाल पैमाने पर उसका उत्पादन बढ़ेगा।

    यह भ्रांत धारणा है कि प्राचीन भारत के धनाढ्य लोग मांसाहार का प्रयोग करते थे। इतिहास से इस जनरल बात को कोई समर्थन नहीं मिलता।

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