बुधवार, 6 जुलाई 2011

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी शाकाहारियों के लिए भी


मित्रों मांसाहार घृणित है, यह अब अधिकतर लोग जानने लगे हैं और शाकाहार अपनाने लगे हैं| यह एक अच्छा संकेत है| किन्तु हम शाकाहारी भी भ्रम में ही हैं कि हम पूर्णत: शाकाहारी हैं| शाकाहार के भ्रम में हम दैनिक जीवन में ऐसी बहुत सी खाद्द वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं जिन्हें मांसाहार की श्रेणी में रखा जाना परम आवश्यक है| हम शाकाहारियों को पहले इन सब का त्याग करना होगा|


अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं|  Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है| अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है| Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है, जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है| इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है| अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है|
(मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें|)
आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है?

दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है| जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं| आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्द पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं| तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं| कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है| वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं|
मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां कैसे बनती हैं? यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं| ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं| मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद सामग्रियों में करते हैं व वे इसे हमसे भी खरीदते हैं|

इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं| सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है| इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है|

बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है|
इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है| नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता| Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है| इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते|
चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है|

इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है|

  • Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है|
  • Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है|
इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं| इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है| तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं|

यह सब आधुनिकता किस काम की? ये सब हमारे ब्रेनवाश का परिणाम है, जो अंग्रेज़ कर गए|

अधिकतर जानकारी का स्त्रोत यहाँ व यहाँ है...

20 टिप्‍पणियां:

  1. सचेत करती जानकारीपरक पोस्ट...... आभार

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  2. दिवस जी,
    यह बहुत ही जाग्रति प्रेरक आलेख है। शाकाहारी खाद्य वस्तुओ में इस प्रकार प्राणीजन्य पदार्थ का उल्लेख करना जरूरी है पर कईं कम्पनियां यह नहीं करती। सवाल यहां शाकाहार की अप्रत्यक्ष अशुद्धता का ही नहीं,बल्कि ऐसे पदार्थों को स्वीकार करने का अर्थ है हिंसा को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन देना।

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    दिनेशजी बहुत बढ़िया जानकारी परक लेख है यह.................स्वयं को चेतने की जरुरत है हमें
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    यह जानकर ख़ुशी हुई की आप जयपुर में ही रहतें है, कभी समय निकाल कर दर्शन देंने की कृपा करें :)
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  4. आदरणीय दिवस भाई जी आपने बहुत ही अच्छी व् तथ्य परक जानकारी दी है ...इस भारत को हमें फिर से गौरव का सम्मान दिलाना है ..बस यु ही लगे रहना .हमको राजीव जी के सपनो को भी मंजिल तक पहुँचाना है ...

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  5. ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद

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  6. अमित भाई आपसे मिलकर मुझे ख़ुशी होगी...कृपया अपना फोन नंबर दें, मेरा नंबर 9829798033
    दिवस

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  7. दिवस दिनेश गौड़ जी बेहतरीन आलेख लिए आपकी पोस्ट बहुत बहु -उपयोगी जानकारी समेटे है अपने लघु कलेवर में .जीवन शैली रोग इसी भ्रष्ट कहाँ पान का नतीज़ा हैं .कविता दोनों बहुत ऊंचे पाए की है प्रकृति ओर समूचे परिवेश को साथ लिए है .तलावारों की मूठें भेद नहीं करतीं

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  8. एक बार फिर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर और मन गढंत बातों द्वारा अपना पक्ष साधने का प्रयास है.
    पाठक गणओं से निवेदन है की DiSodium Inocinate और अन्य बातों पर गूगल या अन्य किसी में खोज करें, सही जानकारी लें और फिर ही इस ब्लॉग पर लिखी किसी बात परा विश्वास करने का जोखिम उठाएं.
    लगता है की असत्य द्वारा ही अपनी बात मनवाने का दृढ़ निश्चय किये हुए हैं.
    एक शाकाहारी ब्लॉग का URL उदाहरण स्वरुप दे रहा हूँ:http://www.vrg.org/blog/2011/03/21/disodium-inosinate-and-disodium-guanylate-are-all-vegetable-flavor-enhancers/

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  9. आक्सड भाई,
    एक बार फिर??? आप पधारे तो पहली बार है,बताईए आपका कौनसा पक्ष है। DiSodium Inocinate के बारे में पाठको को किस खोज में उलझा रहें है जबकि लेखक ने स्वयं स्रोत का उल्लेख किया ही है।

    @सही जानकारी लें और फिर ही इस ब्लॉग पर लिखी किसी बात परा विश्वास करने का जोखिम उठाएं.

    सही जानकारी क्या है आप रख लेते? और जोखिम?? जोखिम किसे है। न खाया तो कोई नुकसान तो होने वाला नहीं, पर खाया तो तो संदेह ही रहेगा। हां जोखिम इस पदार्थ के व्यापारियों और मुनाफ़ाखोरों को है। यदि आप उन्हें सचेत कर रहें है तो अवश्य करें, शायद आपके लोग है।

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  10. अच्छी पोस्ट बहुत अच्छी जानकारी दी आपने और एक बात की हम बाज़ार से मिठाई लेकर भगवान को भोग लगते है उसमे चांदी की परत होती है जो की चांदी को चमड़े के बिच रख कर बनायीं जाती है.

    @aksd:- सब चीजे बिना मांश के भी बन सकती है. पर प्राकृतिक रूप से बनाने से उसकी कोस्ट बढ़ जाती है. और वाही रसायन मांश से प्राप्त करने पर बहुत ही काम खर्च आता है . बहुत से जानवर की हड्डियां केल्सियम का आसान स्त्रोत है. आप चाहें तो मेगी के साथ आने वाले पावडर के पैकेट की लेबोरेटरी जाँच करा कर देखे.

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  11. बेहतरीन पोस्ट, मैं तो वैसे भी चमड़े की किसी भी चीज का प्रयोग नहीं करता

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  12. aksd जी या जो भी आपका नाम है...
    आपको प्रतिउत्तर में भाई सुज्ञ जी से सारे निर्देश मिल ही गए हैं| मेरे विचार से उन्होंने आपकी सभी शंकाओं का समाधान कर ही दिया है|
    फिर भी आपके पास कोई बेहतर जानकारी है तो कृपया यहाँ रखने का कष्ट करें| यहाँ आपकी टिप्पणी पर मोडरेशन नहीं है, बस आप अपनी भाषा पर मोडरेशन लगाए रखना...

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  13. सच उजागर किया है आपने.... हमारी सरकारें बाजारवाद को खुला समर्थन देते हुए, इस तरह के ज्वलंत विषयों पर अकर्मण्य बनी हुई हैं...आज विज्ञापन इतने रोचक बनाए जाते हैं, कि उपभोक्ता वास्तविकता से अनभिज्ञ रह जाता है...विश्व के अधिकाँश देशों में खाद्य पदार्थों में मिलावट व इससे जुड़े कृत्यों के खिलाफ कड़े कानून हैं तथा उन पर अमल भी किया जाता है.. चीन ऐसा ही एक देश है...इस विषय इतना गंभीर है कि "चाणक्य" ने भी इसे घोर अपराध माना था...पर दुर्भाग्यवश हम भारतीय ऐसी ही चीजों के सेवन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बाध्य किए जाते रहे हैं... स्वदेशी उत्पादों का सेवन हमें राहत देगा....

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  14. मेरे शब्दों के चुनाव ने लेखक और पाठक दोनो को आहत किया है, मैं इसके लिए दोनो से क्षमा प्रार्थी हूँ।

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  15. बहुत ही बढ़िया लेख बहुत ही अच्छा लगा पढ़ कर !

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  16. apane es blog ke madhyam se kahana chahunga ki ,dharati par mool roop se do prakar ke jaeev hain.ek hainchal,dusaren hai achal.chal jeevon m bhi do prakar ho gaye,jaanwar our aadami.fir bhi aadami ne janwaron dwar kiya jaane wala bhojan nahin tyaaga.

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  17. दिवस जी, आज यदि मंगल पांडे जैसे लोग जीवित होते तो हर गली में क्रान्ति हो रही होती.... एक वे लोग थे जो चरबी कारतूस मुँह के स्पर्श मात्र से ही धर्म-भ्रष्ट होना मानते थे एक आज़ के लोग हैं जो जानकार भी अनजान होने का नाटक करते हैं... "अपने बच्चों को चोकलेट खिलाते हुए कहते हैं 'नहीं बेटे इसमें कुछ ग़लत नहीं मिला.. ये तो दूध और चीनी का विशेष कम्बीनेशन हैं."
    धूर्तता को बेनकाब करता ये आलेख मैंने अभी पढ़ा .... साधुवाद.

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  18. आपने बेहद अच्छी वैबसाइट का लिंक दिया है बहुत बढ़िया जानकारी है यह इस वैबसाइट मे अमूल्य जानकारिया है आपका बहुत धन्यवाद !!

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  19. आपका बहुत बहुत धन्यावाद

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