गुरुवार, 18 अगस्त 2011

शान्ति और तृप्ति का आधार शाकाहार



निरामिष आहार से हमारे विचार प्रभावित होते हैं। यदि हम मन, वचन और कर्म से पवित्र होना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें शाकाहार, यानी साग-सब्जी से पूर्ण आहार ही लेना चाहिए। कहते है, हर इंसान के मन के एक कोने में पशु सम व्यवहार छुपा होता है। इसलिए यदि हमें उस पशुता के उभार से मुक्त होना है, तो मांसाहार का त्याग करना ही होगा।


हमें न केवल अपनी जीभ के स्वाद के लिए दूसरे जीवों को हानि पहुंचाने से बचना होगा, बल्कि उनकी रक्षा के लिए लगातार प्रयास भी करते रहना होगा। इसलिए ऐसा भोजन ही करना चाहिए, जो न केवल पौष्टिक हो, बल्कि उसे खाने से किसी जीव की हानि भी न हो। निरामिष आहार किसी भी व्यक्ति के जीने की शैली भी निर्धारित करता है। ऐसे आहार न केवल दिल, बल्कि शरीर को भी मजबूत करते हैं। देखा गया है कि शाकाहार से न केवल हमारे विचार अच्छे होते हैं, बल्कि दया, करूणा क्षमा आदि भावों का भी विकास होता है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग जीने के लिए भोजन करते हैं, न कि भोजन के लिए जीते हैं। स्मरण रहे कि आहार जीवन के लिए मात्र एक साधन है, साध्य नहीं।

प्राणिविज्ञान के अनुसार, मनुष्य भी पशु जगत का ही एक प्राणी है, लेकिन उसकी बुद्धि और संवेदनाएं ही उसे पशुओं से अलग करती हैं। यह करुणा का ही भाव है, जो उसे अपने आहार के लिए दूसरे प्राणी का प्राण नहीं लेने की प्रेरणा देता है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो पाएंगे कि हमारी तरह ही दूसरे प्राणियों को भी जीने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

यदि जीवन प्रकृति है, तो जीवन का नाश विकृति है। हम अपनी भूख को मिटाने के लिए भोजन तो करते हैं, लेकिन सच तो यह है कि इससे हमारी आत्मा भी प्रभावित होती है। यदि हम मांसाहारी हैं, तो इसके लिए पहले हमें मूक एवं निर्बल पशुओं की हत्या से जुड़ना पडता है और हत्या-हिंसा के कारण ही सभी अशांतियों का जन्म होता है। दूसरी ओर, शाकाहार के लिए हमें हिंसा की जरूरत नहीं पडती है, इसलिए आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है।

10 टिप्‍पणियां:

  1. हर इंसान के मन के एक कोने में पशु सम व्यवहार छुपा होता है। इसलिए यदि हमें उस पशुता के उभार से मुक्त होना है, तो मांसाहार का त्याग करना ही होगा।...

    Very convincing logic. People must pay heed to it.

    .

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  3. जैसा खाओ अन वैसा हो मन .........बहुत अच्छी व सार्थक संकलन ...

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  4. शान्ति और तृप्ति का आधार शाकाहार...

    सत्य है....

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  5. सौ प्रतिशत सही बात|
    FOOD IS FOR LIVING, NOT FOR ENJOYMENT ...

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  6. सौ फी सदी सच बात कही है इस लेख में. जैसा अन्न वैसा मन.

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  7. @यह करुणा का ही भाव है, जो उसे अपने आहार के लिए दूसरे प्राणी का प्राण नहीं लेने की प्रेरणा देता है।
    सुन्दर!

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  8. यदि जीवन प्रकृति है, तो जीवन का नाश विकृति है। मूक एवं निर्बल पशुओं की हत्या एक विकृति है। जो सभी तरह की अशांतियों की जन्मदात्री है। हमारी बुद्धि और संवेदनाएं ही हमारा करुणा का ही भाव है, जो हमें मात्र आहार के लिए दूसरे प्राणी का प्राण हरने की इजाज़त नहीं देता।

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