गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।।


वेद  का अर्थ ज्ञान होता है. वेद को ज्ञान का सर्वोच्च शिखर भी कहा जाता है . और ज्ञान ही ब्रह्म का स्वरुप है. इस तरह वेद और परमात्मा भिन्न नहीं है . और परमात्मा के लिए उपनिषद कहतें है ----
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
                                                   पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते।।

जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी है; अतः वेद में कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्य के लिए परम कल्याणमयी न हो. जब ब्रह्म ही शांत और शिवरूप है तब उसी का ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है

कोई भी सामान्य विचारशील आदमी भी विवेक का उपयोग करे तो उसे जीव हिंसा अनुचित लगने लगती है . यहाँ तक की मांसाहारी लोग भी अगर पशुओं को निर्ममतापूर्वक काटे जाते हुए देख लें तो शायद ज्यादातर मांसाहारी जो की परंपरा से मांसाहारी नहीं है मांसाहार करना छोड़ दें. सामान्य संवेदना भी जिसमें है वह भावनाशील व्यक्ति भी किसी की हिंसा करना तो दूर रहा उसे देखना भी पसंद नहीं कर सकता. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि सामान्य भावशीलता के रहते जो कर्म अनुचित लगता है, उस कर्म का समर्थन,  उद्दात्त और स्वाभाव से ही प्राणिमात्र के कल्याण की कामना करने वाली भारतीय संस्कृति के आधार-ग्रंथों में किस प्रकार हो सकता है.

बहुत से मतवादी लोग वेद पर आक्षेप लागतें है कि वेदों में यज्ञ के लिए पशुहिंसा की विधि है. कहने की आवश्यकता नहीं कि गीता अध्याय सोलह में वर्णित प्रकृति के लोग ही मांस और अश्लीलता के सेवक होते है. और अधिकांशतया ऐसे ही लोगों ने अर्थ का अनर्थ करके वेदों के विषय में अपने सत्यानाशी मत का प्रचलन किया है.

यहाँ  यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावों ने भी किन्ही किन्ही शब्दों का मांस-परक अर्थ किया है. इसका सबसे प्रधान कारण यह है कि उनमें से अधिकाँश परमार्थवादी साधक थे. गूढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर विशेष द्रष्टि रखकर उनका विषद अर्थ करने पर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयों पर नहीं था. इसलिए उन्होंने ऐसे विषयों का वही अर्थ लिख दिया है जो देश की परिस्थिति विशेष में उस समय अधिकाँश में प्रचलित था.

लेकिन इसका मतलब बिलकुल भी यह नहीं है कि वेद में यह अनाचार निर्दिष्ट है. कारण वही कि वेद साक्षात ब्रह्म का  स्वरुप होने से पूर्ण है तथा उनको समझने का प्रयत्न करने वाला जीव अपूर्ण तथा अल्पज्ञ .

वेद की पूर्णता का ज्ञान इस हानिकर तथ्य से भी होता है कि असुर प्रकृति के वैचारिक भी अपने मत के स्थापन के लिए वेद को ही प्रमाण बतलातें है और प्रथम द्रष्टतया यह प्रमाणिक भी भासता है.

पर ऋषियों ने वेदार्थ को समझने के लिए कुछ पदत्तियाँ निश्चित की हैं; उन्हीके हिसाब से चलकर ही हमें श्रद्धापूर्वक  वेदार्थ को समझने की साधना करनी चाहिये 

देवसंस्कृति के मर्मज्ञ ऋषियों ने इसी कारण से वेदाध्ययन करने वालों के लिए दो तत्व अनिवार्य बताए हैंश्रद्धा एवं साधना. श्रद्धा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि आलंकारिक भाषा में कहे गए रूपकों के प्रतिमानशाश्वत सत्यों को पढ़कर बुद्धि भ्रमित न हो जाय. साधना इस कारण आवश्यक है कि श्रवण-मनन-निदिध्यासन की परिधि से भू ऊपर उठकर मन ‘‘अनन्तं निर्विकल्पम्’’ की विकसित स्थिति में जाकर इन सत्यों का स्वयं साक्षात्कार कर सके.  मंत्रों का गुह्यार्थ तभी जाना जा सकता है.

ऋग्वेद में लिखा है -- ' यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्' अर्थात समस्त वेदवाणी यज्ञ के  द्वारा ही स्थान पाती है.  अतः वेद का जो भी अर्थ किया जाये, वह यज्ञ में कहीं-न-कहीं अवश्य उपयुक्त होता हो- यह ध्यान रखना आवश्यक है.  वेदार्थ के औचित्य की दूसरी कसौटी है --- 
'बुद्धिपूर्वा वाक्प्रकृतिर्वेदे' (वैशेषिकदर्शन) 
अर्थात वेदवाणी की प्रकृति बुद्धिपूर्वक है. वेदमंत्र का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धि के विपरीत न हो - बुद्धि में बैठने योग्य हो, इस बात पर भी ध्यान रखने की जरुरत है. साथ ही यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमने जो अर्थ किया है, वह तर्क से सिद्ध होता है या नहीं.  स्म्रतिकार भी कहतें है - ''यस्तर्केणानुसन्ध्त्ते स धर्मं वेद नापरः'
' जो तर्क से वेदार्थ का अनुसंधान करता है, वही धर्म को जानता है, दूसरा नहीं'    अतः समुचित तर्क से समीक्षा करना वेदार्थ के परिक्षण का तीसरा मार्ग है.

चौथी रीति यह है कि इस बात पर नज़र रखी जाए कि हमारा किया हुआ अर्थ शब्द के मूलधातु के उलट तो नहीं है; क्योंकि निरुक्तकार ने धातुज अर्थ को ही ग्रहण किया है . इन चारों हेतुओं को सामने रखकर यदि वेदार्थ पर विचार किया जाये तो भ्रम कि संभावना नहीं रहती है ऐसा महापुरषों ने निर्देशित किया है.

संस्कृत भाषा की वैदिक और लौकिक इन दो शाखाओं में से वेद की भाषा प्रथम शाखा के अंतर्गत है.
वेद कि भाषा अलौकिक है और इसके शब्दरूपों में लौकिक संस्कृत से पर्याप्त अंतर है. इसलिए वेदों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ में अनेक भ्रांतियां भी है.

वैदिक शब्दों के गूढ़ अर्थों के स्पस्थिकरण के लिए 'निघंटु' नाम के वैदिक भाषा के शब्दकोष की रचना हुई तथा अनेक ऋषियों ने 'निरुक्त' नाम से उसके व्याख्या-ग्रन्थ लिखे.
महर्षि यास्क ने अपने निरुक्त में अट्ठारह निरुक्तों के उद्धरण दियें है. इससे पता चलता है कि गूढ़ वैदिक शब्दों कि अर्थाभिव्यक्ति के लिए अट्ठारह से ज्यादा निरुक्त-ग्रंथों कि रचना हो चुकी थी.
वेदार्थ निर्णय में महर्षि यास्क ने अर्थगूढ़  वैदिक शब्दों का अर्थ प्रकृति-प्रत्यय-विभाग की पद्दति से स्पष्ट किया है.
इस पद्दति से अर्थ के स्पष्ठीकरण में यह सिद्ध करने का उनका प्रयास रहा है कि वेदों में भिन्नार्थक शब्दों के योग से यदि मिश्रित अर्थ की अभिव्यक्ति होती है तो गुण-धर्म के आधार पर एक ही शब्द विभिन्न  सन्दर्भों में विभिन्न  अर्थों का द्योतन करता है.
उदहारण के लिए निरुक्त के पंचम अध्याय के प्रथम पाद में 'वराह' शब्द का निर्वचन दृष्टव्य  है.

संस्कृत में 'वराह' शब्द शूकर के अर्थ में ही प्रयुक्त हैपर वेदों में यह शब्द कई भिन्न अर्थों में भी प्रयुक्त है. जैसे --
१. 'वराहो मेघो भवति वराहार:' 
    ----- मेघ उत्तम या अभीष्ट आहार देने वाला होता है, इसीलिए इसका नाम 'वराह' है.

२. 'अयाम्पीतरो वराह एतस्मादेव। वृहति मूलानि। वरं वरं मूलं वृह्तीति वा।' 'वराहमिन्द्र एमुषम्'
 ----- उत्तम-उत्तम फल, मूल आदि आहार प्रदान करने वाला होने के कारण पर्वत को भी 'वराह' कहतें है.

३.  ' वरं वरं वृहती मूलानी'
 ----- उत्तम-उत्तम जड़ों या औषधियों  को खोदकर खाने के कारण शूकर  'वराह' कहलाता है.

हिंदी में  'गो' शब्द गाय के अर्थ में ही प्रयुक्त है पर संस्कृत में गाय और इन्द्रिय के अर्थ में प्रयुक्त है. वही वेदों में 'गो' गाय तथा इन्द्रिय के अर्थ में तो है ही, महर्षि यास्क के अनुसार 'गौर्यवस्तिलो वत्सः' अर्थात गो  'यव' के और तिल 'वत्सः' के अर्थ में भी प्रयुक्त है.

सभी जानतें है, कि लगभग सभी भाषाओँ में अनेकार्थी शब्द होतें है.  काव्य में उनका अलंकारिक प्रयोग भी किया जाता है और सहज रूप से भी वे भाषा में प्रयुक्त होते रहतें है. उनका सन्दर्भ के अनुरूप कोई एक अर्थ ही निकाला जाता है. दूसरा अर्थ निकालना अपने अज्ञान या भाषा के प्रति अन्याय का ही प्रमाण होता है.

तर्क और बुद्धि  से भी यही बात मालूम होती है की वेद हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्यों के लिए आदेश नहीं दे सकतें है. यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती भी है तो वह अर्थ  करने वालों की ही भूल है .
प्राय यज्ञ में पशुवध की बात बड़े जोर शोर से उठायी जाती है. पर यज्ञ के ही जो प्राचीन नाम मिलतें है, उनसे यह सिद्ध हो जाता है की यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक ही होते आयें है. 
निघंटु में यज्ञ के १५ नाम दियें है -
१. यज्ञ --- यह यज् घातु से बना है. यज् देवपूजा-संगतिकरण-दनेशु- यह सूत्र है.  देवों का पूजन अर्थात श्रेष्ठ प्रवृति वालों का सम्मान अन्सरन करना ,  प्रेमपूर्वक हिलमिल कर सहकारिता से रहना यज्ञ है.

२. वेनः --- वें-गति-ज्ञान-चिंता-निशामन वादित्र- ग्रहणेषु  अर्थात गति देने, जानने, चिंतन करने, देखने, वाध्य बजने तथा ग्याहन करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.

३. अध्वर: --- 'ध्वरति वधकर्मा '  'नध्वर:'  इति  अध्वर'   - अर्थात  हिंसा  का  निषेध  करने  वाला . इस  संबोधन  से  भी  स्पष्ट  होता है कि हिंसा का निषेध करने वाले कर्म के किसी अन्य नाम का अर्थ भी हिन्सापरक नहीं हो सकता है.  सभी जानतें है की यज्ञ कर्म में भूल से भी कोई कर्मी-कीट अग्नि से मर ना जाये इसके लिए  अनेक सावधानियां बरती जाती है. वेदी पर जब अग्नि की स्थापना होती है तो उसमें से थोड़ी सी आग निकालकर बाहर रख दी जाती है कि कहीं उसमें 'क्रव्याद' (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली आग ) के परमाणु न मिल गएँ हो, इसके लिए 'क्रव्यादांशं त्यक्त्वा' होम की विधि है.

४.  मेध: --- मेधृ- मेधा, हिंसनयो:  संगमे  च ---  मेधा(बुद्धि) का संवर्धन, हिंसा और संगतिकरण इसके अर्थ है. अब जब यह यज्ञ अर्थात  अध्वर: का पर्यायवाची संबोधन है तो यज्ञीय सन्दर्भ में इसका अर्थ हिन्सापरक लेना सुसंगत किस तरह होगा ?

५. विदध् -- विद ज्ञाने सत्तायाम, लाभे, विचारणे, चेतना-आख्यान-निवासेषु।
६. नार्यः  ---  नारी 'नृ -नये' मनुष्यों के नेतृत्व के लिए, उन्हें श्रेष्ट्र मार्ग पर चलने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.
७. सवनम् --- सु-प्रसवे-एश्वर्यो: ---- प्रेरणा देना, उत्पन्न कर्ण और प्रभुत्व  प्राप्त करना.
८. होत्रा---      हु-दान-आदानयो:, अदने -- सहायता देना, आदान-प्रदान करना एवं भोजन करना इसके भाव है.
९. इष्टि , १०. मख: , ११. देव-ताता , १२. विष्णु , १३. इंदु , १४. प्रजापति , १५. घर्म: 
उक्त सभी संबोधनों के अर्थ देखने से भी यही निष्कर्ष निकलता है की यज्ञ में हिंसक कर्मों का समावेश नहीं है.  एक सिर्फ मेध शब्द का एक अर्थ हिंसापरक है लेकिन यज्ञीय सन्दर्भ में उसकी संगती अन्य पर्यायवाची  शब्दों के अनुसार ही होगी ना कि अनर्थकारी असंगत हत्या के अर्थ में.

यहाँ थोडा विचार आलभन और बलि शब्दों पर भी कर लेना चाहिये.

आलभन का अर्थ स्पर्श, प्राप्त करना तथा वध करना होता है. पर वैदिक सन्दर्भ में इसका अर्थ वध के सन्दर्भ में असंगत बैठेगा जैसे कि --- 
  'ब्राह्मणे ब्राह्मणं आलभेत'
  ' क्षत्राय राजन्यं आलभेत
इसका सीधा अर्थ होता है ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण को प्राप्त करें, उसकी संगती करें और शौर्य के लिए  क्षत्रिय को प्राप्त करें उसकी संगती करें. 

पर  यदि आलभेत का अर्थ  वध लिया जाये तो बेतुका अर्थ बनता है, ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण तथा शौर्य के लिए क्षत्रिय का वध करें

बलि --- इस शब्द का अर्थ भी वध के अर्थ में निकाला जाने लगा है , जबकि वास्तव में सूत्र है -- बलि-बल्+इन्  , अर्थात आहुति,भेंट, चढ़ावा तथा भोज्य पदार्थ अर्पित करना.
हिन्दू  ग्राहस्थ के नित्यकर्मों में 'बलि वैश्व देवयज्ञ' का विधान है. इसमें भोजन का एक अंश निकालकर उसे अग्नि को अर्पित किया जाता है, कुछ अंश निकालकर पशुपक्षियों व चींटियों के लिए डाला जाता है . बलि कहलाने वाली इस क्रिया में किसी जीव का वध दिखाई देता है या दुर्बल जीवों को भोजन द्वारा बल-पोषण देना दिखाई देता है ?
स्पष्ट है 'बलि' बलिवैश्व के रूप में अर्पित अन्नादि ही है. बलि का अर्थ 'कर-टैक्स' भी होता है.

रघुवंश महाकाव्य में राजा दिलीप की शाशन व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है ----
 
प्रजानेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत
सहस्रगुणमुत्स्रष्ठुम  आदत्ते हि रसं रवि:

यहाँ भी बलि का प्रचलित अर्थ किया जाय को कैसा रहेगा ?????

श्राद्ध कर्म में गोबली, कुक्कुर बलि, काकबलि, पिपिलिकादी बलि, का विधान है उसमें गौ, कुत्ता, कौआ और चींटी के लिए श्रद्धापूर्वक भोज्यपदार्थ अर्पित किया जाता है ना कि उनके वध किया जाता है.

वृहत्पाराषर में  कहा गया है कि श्राद्ध में मांस देने वाला व्यक्ति मानो चन्दन की लकड़ी  जलाकर उसका कोयला बेचता है. वह तो वैसा ही मूर्ख है जैसे कोई बालक अगाध कुँए में अपनी वस्तु डालकर उसे वापस पाने की इच्छा करता है.

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि न तो कभी मांस खाना चहिये, न श्राद्ध में ही देना चहिये.

वेदों की तो यह स्पष्ट आज्ञा है कि--- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि "  (किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे).

जारी .......

179 टिप्‍पणियां:

  1. अतिसुन्दर विवेचना...

    साधुवाद...आभार...

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  2. अमित जी,

    वेदों पर हिंसा का आरोपण करके, ये लोग वेदों को अहिंसा के सर्वोच्छ सिद्धांत शिखर से उतारने को तत्पर बने है। आपका प्रयास वंदनीय है। ऐसे ही भ्रमखण्डन से शुद्ध-वेदों की रक्षा होगी। और हमारी संस्कृति अपना विशिष्ठ स्थान कायम भी रहेगा।

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  3. ऋषि दयानंद ने इस दिशा में ठोस प्रयास किए और उनके सुपरिणाम भी निकले।
    यज्ञों में विभिन्न पशुओं की बलि दिए जाने की बात मान लेने के कारण ही उन्हें संपन्न करना कठिन होता गया अन्यथा यज्ञ आज भी संपन्न किए जा सकते हैं।

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  4. अमित जी,

    इस सुन्दर आलेख के लिये साधुवाद स्वीकारें। अपौरुषेय वेदत्रयी हो या भारतीय परम्परा के अन्य ग्रंथ, हमारे मनीषियों ने सदा जीवन का आदर और कण कण में परमेश्वर का अंश देखने की शिक्षा दी है। अब यह हम पर है कि हम कितना समझते और सीखते हैं।

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  5. यज्ञ में पशुबलि की सनातन परंपरा
    क्रतौ श्राद्धे नियुक्तो वा अनश्नन् पतति द्विजः .
    -मनु. 3, 55
    अर्थात यज्ञ और श्राद्ध में जो द्विज मांस नहीं खाता, वह पतित हो जाता है.
    ऐसी ही बात कूर्मपुराण (2,17,40) में कही गई है.
    विष्णुधर्मोत्तरपुराण (1,40,49-50) में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्राद्ध में भोजन करने वालों की पंक्ति में परोसे गए मांस का भक्षण नहीं करता, वह नरक में जाता है.
    (देखें, धर्मशास्त्रों का इतिहास, जिल्द 3 , पृ. 1244)
    महाभारत में गौओं के मांस के हवन से राज्य को नष्ट करने का ज़िक्र मिलता है। दाल्भ्य की कथा में आता है-
    यदृच्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तम
    एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबंधो यदीच्छसि
    स तूतकृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः
    जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा.
    अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम्
    बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः.
    स तैरेव जुहावस्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ..
    तस्मिंस्तु विधिवत् सत्रे संप्रवृत्ते सुदारूणे .
    अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव .
    -महाभारत , शाल्यपर्व , 41,8-9 व 11-14
    अर्थात इन मृत गौओं को यदि ले जाना चाहते हो तो ले जाओ.
    दाल्भ्य ने उन मृत गौओं का मांस काट काट कर सरस्वती के किनारे अवाकीर्ण नामक तीर्थस्थल पर अग्नि जला कर हवन किया.
    विधिपूर्वक यज्ञ के संपन्न होने पर राजा धृतराष्ट्र का राज्य क्षीण हो गया.

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    1. यज्ञ और श्राद्ध में पशु बलि का वेदों में कही वर्णन नहीं है और आपने सूत्र लिखा है वो प्रक्षिप्त है ..

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  6. अनुमन्ता, विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
    संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥५१॥ मनुस्मृति

    सम्मति देने वाला, अंग काटने वाला, मारने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला, खाने वाले - ये सब घातक हैं । अर्थात् मारने वाले आठ कसाई होते हैं । ऐसे हिंसक कसाई अधर्मियों के लोक परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं ।

    योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया ।
    स जीवंश्च मृत्श्चैव न क्वचित् सुखमेधते ॥
    मनुस्मृति.


    जो अहिंसक निर्दोष प्राणियों को खाने आदि के लिये अपने सुख की इच्छा से मारता है वह इस लोक और परलोक में सुख नहीं पाता ।

    **********************************

    कूर्मपुराण उपरिविभाग अध्याय ३२ ----

    चान्द्रायणम पराकं वा गां हत्वा तू प्रमादतः /
    मतिपूर्वं वधे चास्याः प्रायश्चित्तम न विद्यते //कू० पु ० २/३२ /५९
    प्रमादवश अनजाने में गौ की हत्या करने पर चान्द्रायण अथवा पराक व्रत करना चहिये और जान बूझकर वध करने पर इस हिंसा का कोई प्रायश्चित नहीं है .

    कूर्मपुराण उपरिविभाग अध्याय ३३, अभक्ष्य-भक्षण प्रायश्चित्त प्रकरण श्लोक ८-१६ ------
    नरमांसाशनं कृत्वा चान्द्रायणमथाचरेत
    काकं चैव तथा श्वानम जग्ध्वा हस्तिनमेव च
    वराहं कुक्कुटं चाथ तप्तकृछेंण शुध्यति //८//
    ................................................
    ................................................//९,१०,११,१२,१३,१४,१५//
    शुनो मांसं शुष्क्मांसमात्मार्थं च तथा कृतं
    भुक्त्वा मांसं चरेदेतत तत्पापस्यापनुतत्ये //१६//

    मनुष्य का मांस भक्षण करने पर चान्द्रायण व्रत करना चहिये. कौवा, कुत्ता, हाथी, वराह और कुक्कुट मांस खाने पर तप्तकृछ्र व्रत से शुद्धि होती है .
    मांस खाने वाले जानवरों , सियारों तथा बंदरों का मांस तथा मॉल-मूत्र भक्षण करने पर तप्तकृछ्र व्रत करना चहिये तथा बारह दिनों तक उपवास करके कुष्मांड -संज्ञक मन्त्रों से घी की आहुती देनी चहिये. नेवला , उल्लू, तथा बिल्ली का मांस भक्षण करने पर सांतपन व्रत करना चहिये. शिकारी पशु, ऊंट और गधे का मांस खाने पर तप्तकृछ्र व्रत से शुद्धि होती है . पहले निर्दिष्ट विधान के अनुसार व्रत के समान ही संस्कार भी करना चहिये.
    बगुला,बलाक,हंस,कर्णाव,चक्रवाक तथा प्लाव पक्षी का मांस भक्षण करने पर बारह दिन तक कुछ नहीं खाकर प्रय्चित करें . कपोत, टिड्डी, तोता,सारस,उल्लू, तथा कलहंस का मांस भक्षण करने पर भी यही व्रत करना चहिये. शिशुमार, नीलकंठ, मछली का मांस तथा गीदड़ का मांस खाने पर भी यही व्रत करना चहिये . कोयल, मछली, मेंडक तथा सर्प का भक्षण करने पर एक महीने तक गौमूत्र में अधपके जौ के सत्तू का भक्षण करने पर शुद्धि होती है. जलचर, जलज, प्रत्तुद यानी चोंच से खोदकर खाने वाले कौआ आदि अन्य पक्षी , नखविषिकर नख से खोदकर खाने वाले तितर आदि और लाल पैर वाले पक्षियों का मांस भक्षण करने पर एक सप्ताह तक उपर्युक्त व्रत करना चहिये . शुन आदि का मांस खाने पर एक महीने तक उपर्युक्त व्रत करना चहिये. कू० पु ० २/३३/८-१६

    **************************************

    महाभारत ---

    सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
    धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥
    (शान्तिपर्व २६५।९॥)

    सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि खाना धूर्तों ने प्रचलित किया है, वेद में इन पदार्थों के खाने-पीने का विधान नहीं है ।

    अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः । (आदिपर्व ११।१३)

    किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

    प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम ।
    अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥
    (कर्णपर्व ६९।२३)

    मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

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    1. अति सुन्दर.....अनवर जमाल जैसे लोगों को तो सन्स्क्रित शब्दों के अर्थ तक पता नहीं हैं.....ऊल-जुलूल अर्थ लगा कर खुश होते रहते हैं...

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  7. वेदों की तो यह स्पष्ट आज्ञा है कि--- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि " -(किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे).

    चलो यह स्थापना तो हुई कि वेद-वेदांगों में कोई हिंसात्मक उपदेश नहीं है, और न पवित्र यज्ञों में हिंसा की कोई आज्ञा।

    वेद से कोई नया सन्दर्भ भी अप्रसतुत है। वेद-वेदांग से इतर, वेदेतर वाञ्ग्मय साहित्य पर चर्चा चल पडी है।

    अमित जी नें मनुस्मृति से पाप संकेत, कूर्मपुराण से अभक्ष्य-भक्षण प्रायश्चित्त और महाभारत से सिद्ध किया कि मांसाहार धूर्त-प्रवर्तित है, और अहिंसा परम् धर्म है।

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  8. माननीय अमित शर्मा जी,

    आपनें तो एक ही सूत्र में, वेद से लेकर महाभारत तक, वेदों में हिंसा की कल्पना करने वाले आक्षेप का पटाक्षेप कर दिया।

    महाभारत के शान्तिपर्व का श्रलोक- २६५:९

    सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
    धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

    सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

    साधुवाद!!!

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  9. आलेख और फिर टिप्पणी में व्यक्त शंकाओं के समाधान के लिये आभार अमित!
    यह साफ़ हुआ कि रस्सी में साँप देखने-दिखाने वाले कुछ "विद्वान" स्वर्णयुग में भी होते थे।

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  10. सुंदर विवेचना के लिए बधाई,...

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  11. @ गौओं के मांस के हवन से राज्य को नष्ट करने

    जी अनवर जमाल भाई साहब | परन्तु यदि यज्ञ को वेदों के अनुरूप समझने हो - तो सद्गुरु के कहे अनुसार समझना है | कृष्ण से बढ़ कर कोई सद्गुरु नहीं मिलता, और गेट से बढ़ कर पाठ नहीं - सो वहीँ से कहूँगी - गीता में सोलहवे अध्याय के सत्रहवे श्लोक में देखें -

    आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ॥
    यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम ॥१६।१७ ॥

    self complacent , impudent, deluded by wealth and ego, they sometimes proudly perform sacrifices IN NAME ONLY without following rules or regulations

    यह जो आप बार बार उदाहरण देते हैं - ये आसुरी प्रवृत्ति के बनाये rules and regulations हैं - यह जो आप यज्ञ कह रहे हैं - यह भी शत्रु भाव से किया हुआ ही है | ऐसे और उदहारण मिल जायेंगे आपको | जैसे - राम से युद्ध के समय रावण के पुत्र इन्द्रजीत ने भी यज्ञ किया - जिसमे मांस और खून चढ़ाया | तो यदि ऐसे स्वाभाव के बनना हो, ऐसे goals achieve करना हो - तो ऐसे यज्ञ भी ऐसे लोगों ने किये हैं | सीखने को सब कुछ है - परम पिता की दी हुई अच्छाई भी है, शैतान की दी हुई buraai भी | ऐसे तो आदम ने भी सेब खाया ही था जन्नत में - तो क्या उसका उदहारण लेकर की यह आदम ने किया, इसे परंपरा मन कर हम सब वह वास्तु खाएं / वह कार्य करें , जो परमात्मा के आदेश के विरुद्ध हो ?
    ------------------------

    फिर सत्रहवे अध्याय में arjun उन्हें सतो, रजो और तमोगुणी स्वाभाव समझाने को कहते हैं | इसमें भी भोजन पर बताया है - श्लोक ८, ९, १० में | फिर श्लोक ११, १२, १३ में यज्ञ पर - जिसमे कहा है की कौनसे bhojan aur yagya respectively सतो, रजो और तमोगुण प्रधान लोग करते हैं |

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  12. अन्न प्राप्ति की कामना से जो यज्ञ किए जाते थे , उन में इन्द्र के लिए बैल पकाए जाते थे। ऐसा ऋग्वेद से पता चलता है-
    अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान् पिबसि त्वमेषाम्.
    पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः .
    -ऋग्वेद, 10, 28, 3
    अर्थात हे इंद्र, अन्न की कामना से जिस समय तुम्हारे लिए हवन किया जाता है, उस समय यजमान जल्दी जल्दी पत्थर के टुकड़ों पर सोमरस तैयार करते हैं. उसे तुम पीते हो. यजमान बैल पकाते हैं, तुम उन्हें खाते हो.

    मधुपर्के च यज्ञे च पितृदैवकर्मणि . अत्रैव पशवो हिंस्या
    -मनुस्मृति 5, 41
    अर्थात मधुपर्क , यज्ञ , पितृकार्य (श्राद्ध) तथा देवकार्य (देवताओं की पूजा आदि) के लिए ही पशु का वध करना चाहिए।

    गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोचयते .
    -अनुशासन पर्व , 88, 5
    अर्थात गौ के मांस से श्राद्ध करने पर पितरों की एक साल के लिए तृप्ति होती है।

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    1. आपके सारे अर्थ ऊल-जुलूल हैं....

      १-गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोचयते .....इसमें मांस शब्द कहां है?....दत्तं का अर्थ देना होता है... अर्थात गौदान से.....त्रप्ति...आदि

      -२-...व्रिषभ---स्वयं इन्द्र को कहा है...= बलवान
      ३-- मधुपर्क अर्थात शहद के लिये क्यों पशु वध करना चाहिये ?

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  13. वेदों को जानना हो - तो निर्देश है की सिर्फ भाषा नहीं - जानने वाले गुरु से जानना है - क्योंकि भाषा के अर्थों के जैसे अनर्थ आप कर रहे हैं - ऐसे होने की संभावना बहुत है - क्योंकि एक शब्द के एक से अधिक अर्थ हैं | जैसे गो - गाय है या इन्द्रिय ? दुहिता पुत्री है या गौ दुहने वाली ? कुमारिका ? रिषभ ? आदि

    तो गुरु की शरण में सीखना है - केवल भाष्यकारों से वही होगा जो आपके साथ हो रहा है | जैसा आपके ही कथन के ही अनुसार यदि हम पवित्र कुरआन के सिर्फ translations देखें, जानकारों से न सीखें - तो हम नहीं जान सकते - वही बात वेदों के साथ भी लागू है |

    वेद श्रुत ज्ञान थे - लिखे तो बहुत बाद में गए - सुन कर ही प्राप्त हुए - पहले श्री विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा आये - उन्होंने ध्यान किया - विष्णु ने उन्हें वेद दिए - फिर ब्रह्मा ने अपने मानस पुत्रों को - ऐसे यह परंपरा बढ़ी | लिखे तो बहुत समय बाद में वेदव्यास जी के द्वारा गए | तो बिना गुरु परंपरा के सिर्फ मन मर्जी अर्थों के translations से इन्हें समझा ही नहीं जा सकता |

    आपके कथन के अनुसार (मैं नहीं जानती असल में यह बात महाभारत में है या नहीं - किन्तु मान रही हूँ की आप सत्य कह रहे होंगे ) \

    १.उपरोक्त यज्ञ गायों को मार कर नहीं - मरी गायों की लाशों से हुआ |
    २. यह द्वेष और बदले के लिए हुआ |
    ३. ऐसे यज्ञ आसुरी (तामसिक) हैं |
    ४.यज्ञों की ३ categories हैं - सतो / रजो / तमो गुणी | जिन शोक्तियों को प्रसन्न कर के जिन उद्देश्यों के लिए हों - उसके अनुसार |
    ५. ॐ तत सत - कर्त्तव्य भाव से (सतो) ; कुछ अच्छे उद्देश्य के लिए (जनक जी ने धरती जोती - (रजो) ; और निज लाभ /दूसरे की हानि के लिए (तमो)
    ६. वेद - अर्थात ज्ञान को जान लेना - विदित होना |
    ७. सब तरह का ज्ञान है - + भी, और minus भी | वेदों में SAB है |
    ८. अब nuclear technology लीजिये - एक तो उससे हम power प्लांट लगायें, या फिर nuclear bomb बनाएं - यह हम पर है |

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    1. मधुपर्क का अर्थ दही , शहद , घी के योग से भी लगाया जाता है ..

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  14. सार्थक और विस्तृत विवेचना ..... आभार

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  15. @गव्येन दत्तं श्राद्धे

    dattam - ka artha "daan dena" hota hai ya maarna ????? fir se man marji ke artha / anarth ???

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  16. मनुस्मृति में माँसाहार निषेध

    यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च
    तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन ॥ (मनुस्मृति- 5:47)

    -ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है

    नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्
    न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत् ॥ (मनुस्मृति- 5:48)

    -किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है इसलिए यह निश्चित है कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों को मांस भक्षण वर्जित करना चाहिए।

    अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
    संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

    अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं ।

    मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद् म्यहम्।
    एतत्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनुस्मृति- 5:55)

    अर्थ – जिस प्राणी को हे मनुष्य तूं इस जीवन में खायेगा, अगामी जीवन मे वह प्राणी तुझे खायेगा।

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  17. प्रकृति खंड में महादेव सुयज्ञ नामक राजा का वर्णन करते हैं, जिसके राज्य में सुपक्व मांस ब्राह्मणों के लिए नित्य दिया जाता है.
    सुपक्वानि च मांसानि ब्राह्मणेभ्यश्च पार्वति..
    ब्रह्मवैवर्त पुराण, 50, 13

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    1. पुराणों के उद्धरण को प्रमाणिक नहीं माना जा सकता है ..

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  18. वस्‍तुत: संस्‍कृत शब्‍दों के पुरातन प्रयोग अगर आज उसी रूप में भी रखे जाते हैं तो भी शब्‍दार्थ का एकधा ज्ञान होने के कारण ही ब्‍यक्ति शंकित हो जाता है।
    कुछ बहुप्रचलित उदाहरण प्रस्‍तुत कर रहा हूं जिनका आप लोक में भी बहुधा प्रयोग देखते होंगे पर आज उनका सामान्‍य रूप से प्रयोग किये जाने पर दुर्घटनाएं जन्‍म ले सकती हैं।
    1-सैन्‍धव शब्‍द का दो अर्थ क्रमश: घोडा तथा नमक होता है।
    कोई ब्‍यक्ति भोजन पर बैठा है और सैन्‍धवमानय यह आदेश देता है तो वहां अगर हम नमक के बदले घोडा ले जाएं तो द्वन्‍द्व की स्थिति उत्‍पन्‍न हो जायेगी।
    2-गायत्रीमंत्र में प्रयुक्‍त शब्‍द प्रचोदयात
    प्रचोदयात शब्‍द प्र उपसर्ग पूर्वक चुद् धातु से बना है जिसका अर्थ प्रेरित करना होता है। इसके रूप पठ के सदृश ही चलते हैं।
    अब आज आप अगर इस धातु का प्रयोग (त्‍वं पठितुं स्‍व बालिकां चुदसि- तुम पढने के लिये अपनी बालिका या पुत्री को प्ररित करते हो) आप लोक में कर दें तो आप पर लाठियां भी बरस सकती हैं।
    3-अभिज्ञान शाकुन्‍तल के चतुर्थ अध्‍याय में प्रयुक्‍त शब्‍द (चूतशाखावलम्बिता)
    चूत का अर्थ आम या आम के पेड से है मगर आज आप इनका प्रयोग जनसामान्‍य में कर दीजिये तो जाने क्या गजब हो जाए।
    ऐसे ही कई और शब्‍द हैं जिनका प्रयोग आज अप्रासंगिक है पर पहले जो काव्‍य की शोभा या लालित्‍य बढाने के लिये प्रयुक्‍त होते थे, और क्‍यूंकि तब संस्‍कृत जनभाषा थी अत: लोग इनका उचित अर्थ ही ग्रहण करते थे जो आज नहीं है , अब आप ही बताइये इसमें किसी ग्रन्‍थ या ग्रन्‍थकार की क्‍या गलती।
    साभार -आनंद पांडेयजी के ब्लॉग महाकवि वचनं से
    http://www.kavyam.co.in/2010_05_01_archive.html

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    1. सुन्दर अति सुन्दर अमित जी...जमाल जैसे लोगों को सन्स्क्रित का ग्यान कहां....सिर्फ़ अपनी दुकान चलान चाहते हैं...

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  19. संस्कृत एक अति समृद्ध भाषा है। इसमें कुछ शब्द ऐसे भी हैं जिनके अर्थ एक से ज़्यादा हैं। यदि एक अर्थ के बजाय अन्य अर्थ ले लिया जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इस समस्या का निराकरण वेद के विद्वान सदा से करते ही आये हैं क्योंकि यह समस्या नई नहीं है।
    सायण और महीधर आदि के भाष्य इसी समस्या को हल करने के लिए लिखे गए हैं और आज भी हिंदू धर्म के सर्वोच्च अधिकारी शंकराचार्य इस समस्या का निराकरण करने में सक्षम हैं।
    यदि इनके माध्यम से वेद को जाना जाए तो वेद के प्राचीन परंपरागत अर्थ समझने में किसी तरह की परेशानी पेश ही नहीं आती।

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    1. सायण और महीधर ने उचित अर्थ किये हैं न कि अनर्थ....शन्कराचार्य एक विशेष तन्त्र के सर्वोच्च हैं ...न कि सारे हिन्दू धर्म के...

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    2. दयानंद के भाष्य से क्यों डरते हैं मिया अनवर जमाल :D
      अरब कि जंगली प्रवर्तियो का मोहम्मद ने सिर्फ विस्तार किया अब क्यों आप लोग उसी जंगल युग में रह रहे हैं | मानवता कि ओर आने का प्रयास तो कर हि सकते हैं यदि देवत्व कि ना सोच सके |

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  20. सायण का भाष्य काफ़ी हद तक कर्मकाण्डपरक है। कह सकते हैं कि संहिताओं का अर्थ करने के लिए सायण ने ब्राह्मण ग्रंथों की परम्परा को सबसे पुख़्ता आधार माना है। वैसे भी सायण-भाष्य में पूर्वमीमांसा का गहरा प्रभाव साफ़ नज़र आता है। सायण भाष्य के बारे में महर्षि अरविन्द का कथन है – “सायण की प्रणाली की केन्द्रिय त्रुटि यह है कि वह सदा कर्मकाण्ड विधि में ही ग्रस्त रहता है और निरंतर वेद के आशय को बलपूर्वक कर्मकाण्ड के संकुचित सांचे में डालकर वैसा ही रूप देने का यत्न करता है। सायण का ग्रंथ एक ऐसी चाबी है जिसने वेद के आंतरिक आशय पर दोहरा ताला लगा दिया है, सायण भाष्य पढ़कर कोई इतना भर कह सकता है कि यह ब्राह्मण-ग्रंथों का एक्सटेंशन भर है।

    मैक्समूलर नें इसी सायण भाष्य के आधार पर भाष्य प्रस्तुत किया, हालाँकि वेद संहिताओं को विश्व सम्मुख रखने का श्रेय मैक्समूलर को जाता है पर सायण के प्रभाव से विकार स्पष्ट दृष्तिगोचर होता है। मैक्समूलर के भाष्य का सबसे बड़ा दोष यह है भाष्यकार को संस्कृत का गम्भीर ज्ञान न होने की वजह से ज़्यादातर अर्थ सतही ही रह जाता है। इसके अलावा कई पूर्वाग्रह भी साफ़ तौर पर परिलक्षित होते हैं, हालाँकि हो सकता है ऐसा जानबूझ न हो बल्कि अवचेतन रूप से हो गया हो। दूसरा, मैक्समूलर ने कई औसत बुद्धि पण्डितों की सहायता से भाष्य तैयार किया था, इसलिए भाष्य का स्तर उतना अच्छा नहीं है। साथ ही भाष्य में जगह-जगह ‘कंसिस्टेंसी’ का अभाव है।
    (अंश फेस-बुक के वेद पन्ने से साभार)

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  21. कुछ गलत फहमी है जमाल साहब आपको की ईसाईयत में पोप की तरह और इस्लाम में ख़लीफ़ा की तरह से वैदिक परम्परा में श्रीशंकराचार्य एकमेव धर्माधिकार प्रभुत्व संपन्न है . श्रीशंकराचार्य वेदान्त दर्शन में अद्वैत मत प्रतिपादक थे . आपकी जानकारी के लिए बता दूँ , श्री आदिशंकराचार्य से पहले श्रीनिम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत, श्री आदिशंकराचार्य के बाद श्रीरामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत, श्रीमध्वाचार्य ने द्वैतमत और श्रीवल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत मत के अनुसार वैदिक सिधान्तों की स्थापना की थी. सभी आचार्यों की सुगठित और सुप्रचारित शिष्य परम्पराएँ अध्यावधि प्रचलित है. सभी आचार्यपीठों के सारे भारत और विश्व में भी अनेक स्थानों पर अनुयायी है, सभी अपने आचार्य के मत के प्रति अनन्य आग्रही होते हुए भी अन्य आचार्यों के प्रति समान श्रद्धालु हैं. इसलिए आपका यह कथन "हिंदू धर्म के सर्वोच्च अधिकारी शंकराचार्य' थोड़ा असंगत है. हिंदू धर्म का सर्वोच्च अधिकारी कोई भी आचार्य या संस्था नहीं है. महिमामान आचार्यों को तो छोड़िये स्वयं मंत्र द्रष्टा ऋषि गण भी वैदिक धर्म के सर्वोच्च अधिकारी नहीं हैं. यह लोकधर्म का लोकतंत्र है भैया अन्य इस्लाम-इसाई सम्प्रदायों की भांति तानाशाई नहीं :)

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  22. रंजना जी, सुज्ञ जी, अनुरागजी, धीरेन्द्र जी, शिल्पाजी, डॉ॰ मोनिका शर्मा जी बात सिर्फ लेख के अच्छे होने मात्र की या कुप्रचारियों को तथ्य से अवगत कराने भर की नहीं है. क्योंकि तथ्य तो अपने अंतर्मन में यह खुद भी जानते हैं. मूल मुद्दा तो यह है की जैसे स्वयं जमाल साहब के ही ४०-५० ब्लॉग है, उसके अलावा एक एक कुप्रचारी जो की समस्त वैदिक परंपरा के विरुद्ध अनर्गल वमन करतें है, तब उसी अनुपात में सही तथ्यों का प्रकाशन नहीं हो पाता है क्योंकि आप और मेरे जैसे कितना समय इस बात में लगा सकतें है. क्योंकि और भी काम है; जो जिन्हें तनख्वा ही वैदिक परम्परा पर कालिख पोतने की मिलती हो वे कैसे ढील देंगे. जो थोडा सा प्रयास आप-हम करतें है वह इनको तथ्यों से अवगत करवाने के लिए नहीं होता, बल्कि इनके लेखों को ही पढ़कर भ्रमित होने वाले बंधुओं के लिए है. इसलिए हम सभी की कोशिश होनी चहिये की इस बारें में अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित कर नेट पर डालने की कोशिश करें ताकि. भारतीय संस्कृति के वास्तविक पावन स्वरुप से ही सब परिचित हो ना की कुप्रचारियों द्वारा विकृत करके प्रस्तुत किये गए रूप से. यह संस्कृति महान ऋषियों द्वारा, श्रीमहावीर,श्रीबुद्धदेव द्वारा पोषित पल्लवित हुयी संस्कृति है. हमारा इतना कर्त्तव्य तो बनता ही है की कोई इस महान सांस्कृतिक लता को नोंच खसोट ना जाएँ. सर्वकल्याण की भावना, सर्व भूतों के प्रति करुना, विश्वबंधुत्व समता अहिंसा आदि सद्गुणों को अधिक से अधिक अपने जीवन में उतार कर ही हम महान ऋषियों के राम-कृष्ण के श्रीमहावीर-बुद्ध की संतति होने का दावा कर सकतें है. और तभी भारत गौरव के ध्वजवाहक होने के अधिकारी हो सकतें है.

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    1. अत्युत्तम कथन है अमित जी....
      --- ये कुप्रचारी ...मुफ़्त ब्लोग सुविधा का खूब लाभ उठा कर वैदिक व हिन्दू धर्म व समाज को गुमराह कर रहे है..अन्यथा आखिर इन्हें क्या आवश्यकता है कि हिन्दू धर्म पर बात करें ...हम अपना धर्म देख लेंगे ...आप स्वयं अपना देखिये...इन्हें मुंह तोड उत्तर देना अत्यावश्यक है....
      ---आप इस प्रकार वस्तुतः एक यग्य ही कर रहे हैं....

      हटाएं
    2. हमारा इतना कर्त्तव्य तो बनता ही है की कोई इस महान सांस्कृतिक लता को नोंच खसोट ना जाएँ. सर्वकल्याण की भावना, सर्व भूतों के प्रति करुना, विश्वबंधुत्व समता अहिंसा आदि सद्गुणों को अधिक से अधिक अपने जीवन में उतार कर ही हम महान ऋषियों के राम-कृष्ण के श्रीमहावीर-बुद्ध की संतति होने का दावा कर सकतें है.

      बिलकुल करणीय कर्म बताया है अमितभाई, यह हिंसक और भोगी कुसंस्कृतियाँ हमारे विशिष्ट सांस्कृतिक गुण - विश्वबंधुत्व, समता, अहिंसा को विकृत बनाकर पेश कर रहे है। ताकि हम भी इन हिंसको के समान हेय हो जांय। निरामिष मंच से इसी कुसंस्कृति के आगमन को उखाड फैकने का प्रयत्न है।

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  23. अति प्राचीन काल में ही महर्षि वेद व्यास जी का महाभारत में कहा गया यह कथन पुनः दोहराना आवश्यक हो गया है……………

    महाभारत के शान्तिपर्व का श्रलोक- २६५:९

    सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
    धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

    अर्थात् : सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

    वेदों में, किसी भी करण कारण प्रयोजन से हिंसा निषिद्ध ही है। फिर परम पावन अनुष्ठान – आराधना रूप यज्ञ में हिंसा रूप विराधना कैसे कल्पित की जा सकती है। सात्विक देव स्वरूप, सहजबोध मनुष्य तो ऐसा विचार भी नहीं कर सकते।

    साधारण मनुष्य जिस घृणास्पद विकृति की कल्पना तक नहीं कर सकते, उस विकृत हिंसक अर्थ के लिए असुर ही जवाबदार हो सकते है। आज्ञा के विरूद्ध कर्म, विपरित आराधना, यज्ञों को पशुबलि से अपवित्र करने का कार्य असुर ही करते थे। (किसी भी अपवित्र कार्य के लिए “हवन में हड्डी डालने” की कहावत इसीलिए बनी होगी, जो आज भी विद्यमान है) हालांकि सुर व असुर एक ही ॠषि की सन्ताने है, पर स्वभाव से ही उनका कर्म हिंसाप्रधान है। अतः वैदिक मंत्रों का हिंसा युक्त अर्थ और यज्ञों में पशु-बलि का कुकृत्य असुरों की ही प्रस्थापना है।

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  24. सभी समृद्ध भाषाओं में बहुत से शब्द ऐसे ढूँढे जा सकते हैं जिनके अर्थ एकाधिक होते हैं...
    जैसा कि अमित जी और आनंद पाण्डेय जी ने समय-समय पर बताया है. यथा सैंधव jaise shabd ...

    एक बड़ा रोचक प्रसंग है :
    एक मियाँ जी थे. अपने मोहल्ले की बैठक में हमेशा एक पुजारी को यह कहकर नीचा दिखाते रहते थे कि "तुम्हारी संस्कृत भाषा तो बड़ी अजीब है ... गायत्री मंत्र में ही गंदगी भरी हुई है...'प्रचोदयात....' आदि-आदि..."
    एक दिन मोहल्ले में हरियाणा के पंडित रहने आये... मोहल्ले की मासिक बैठक में जब फिर वही बात दोहरायी गयी तो उनसे रहा नहीं गया, बोले..."सुण मियाँ, थारी भाषा कूण सी न्यारी सै, बता इसका क्या अर्थ सै ...."दस्त से खाना परोसा फूफी ने, पेश आब बेगम ने कर दिया."

    सावधान.मियाँ, ... आगे अर्थ के अनर्थ मत करियो.....

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  25. @DR. ANWER JAMAL ने कहा…
    आज भी हिंदू धर्म के सर्वोच्च अधिकारी शंकराचार्य इस समस्या का निराकरण करने में सक्षम हैं।

    ऑफ़ कोर्स, शंकराचार्य जी के सामने कोई समस्या ही नहीं है। समस्या धर्म के अन्य अधिकारी विद्वानों के सामने भी नहीं है। समस्या उन सात्विक धर्मपालकों को भी नहीं है जो वीर अहिंसक सनातन परम्परा से लगातार जुड़े रहे हैं। समस्या उन्हीं के सामने है जो दया और प्रेम की सनातन भारतीय परम्परा को अपने-अपने रंग के चश्मे से परिभाषित करने की टूटी-फ़ूटी कोशिश करते हैं। संकीर्ण सीमाओं का लबादा फेंके बिना महान भारत और उदात्त भारतीय परम्पराओं को समझ पाना कठिन ही नहीं असम्भव है।

    हाँ, जैसा अमित जी ने स्पष्ट किया, आपका वाक्य "हिंदू धर्म के सर्वोच्च अधिकारी शंकराचार्य' वाकई असंगत है। लेकिन भारतीय परम्पराओं के बारे में ऐसी ज्ञानी-अज्ञानी विसंगतियाँ अब मुझे आश्चर्य में नहीं डालती पर वह विषयांतर हो जायेगा।

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  26. वैदिक वांगमय में वृषभ शब्द के अनेक अर्थ हैं जो कि सन्दर्भ पर निर्भर करते हैं। इन अर्थों में एक अर्थ औषधि और एक शक्तिवान भी है।
    @ अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान् पिबसि त्वमेषाम्।
    पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन्हूयमानः॥
    (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 28, मंत्र 3)

    हे इंद्रदेव! आपके लिये जब यजमान जल्दी जल्दी पत्थर के टुकड़ों पर आनन्दप्रद सोमरस तैयार करते हैं तब आप उसे पीते हैं।
    हे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव! जब यजमान हविष्य के अन्न से यज्ञ करते हुए शक्तिसम्पन्न हव्य को अग्नि में डालते हैं तब आप उसका सेवन करते हैं।


    इस मंत्र के सन्दर्भ में यज्ञ और अन्न के सम्बन्ध को पुष्ट करता हुआ गीता का एक मंत्र भी अभी याद आ रह है।

    यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
    भुञ्जते ते त्वघं पापा यह पचन्त्यात्मकारणात्
    (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, मंत्र १३)


    यज्ञ में अन्न का दान करने के बाद बचे हुए अन्न को खाने वाला अमृत खाता है। जो व्यक्ति (देवता, ऋषि, पितर, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता, नदी-सरोवर, समाज आदि का) ऋण न चुकाकर, धन-धान्य को अपना मानकर अकेला हड़प जाता है, वह पाप का भागी बनता है।

    परम्परागत भारतीय घरों में आज भी पहली रोटी गाय की बनती है और भगवान के भोग के बाद भोजन खाया जाता है। यह एक लम्बी सनातन परम्परा है जिसकी भावना को भारतीय मानस आसानी से समझ सकता है।

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    1. ----वे अधर्मी-अग्यानी नहीं जानते( या जानबूझ कर जानना नहीं चाहते) कि वे वास्तविक धर्म व तत्व-ग्यान से बहुत दूर हैं...बहुत दूर...

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  27. अमित जी की ये सार्थक पोस्ट और इस पोस्ट पर आए कमेंट्स को पढ़कर बहुत कुछ जानने को मिला! मेरी राय में ये पोस्ट सभी को अवश्य ही पढ़नी चाहिए! वैसे भी निरामिष पर जितने भी लेख आते हैं वो सभी उच्च कोटि के होते हैं ! यही कारण है कि 'निरामिष' ब्लॉग आज सफलता के नित नए मुकाम छू रहा है! इसका पूरा श्रेय निरामिष के सभी विद्धान लेखकों को जाता है!

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  28. / प्रिय अनुज अमित शर्मा जी !
    1. व्यक्तिगत आक्षेप से बचते हुए केवल पोस्ट के विषय पर बातचीत करना ही ज़्यादा उचित है। जिसे जो काम जितना प्यारा होता है वह उसके लिए उतना ही समय देता है।

    2.वेदांत दर्शन की व्याख्या में मतभेद होने से अलग अलग आचार्यों ने द्वैतवाद आदि मत का प्रतिपादन किया लेकिन शंकराचार्य को सर्वोच्च स्थान जिस काम ने दिलाया वह है वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना का प्रयास, इस प्रयास में कोई भी उनके बराबर न पहुंच सका। उनका प्रयास योजनाबद्ध और संगठित था और उनकी क़ायम की गई पीठों को दुनिया जानती है जबकि दूसरे आचार्यों की पीठों को जानने के लिए और उनके मत का पता करने के लिए बहुत ढूंढ भाल करनी पड़ेगी।
    इसीलिए शंकराचार्य का स्थान उन्हें मानने वालों के लिए तो सर्वोच्च है ही और दूसरे आचार्यों की नज़र में भी वे सम्मानित हैं और ख़ास बात यह है कि इन सबके बीच केवल दार्शनिक अंतर थे लेकिन कर्मकांड को अंजाम देने के मामले में उनमें कोई मतभेद न थे।
    शंकराचार्य कुछ के लिए सर्वोच्च हैं तो बाक़ी के लिए भी उच्च तो हैं ही और ऐसे धर्माधिकारी का मत निश्चय ही उपासना विधि के मामले में तो निर्णायक माना ही जाना चाहिए।

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    1. जमाल साहब यही तो आपका अग्यान है....अमित ने एक दम सही कहा है ...न तो शन्कराचार्य सर्वोच्च सता हैं....न हिन्दू धर्म किसी एक किताब पर चलता है वह मानव-व्यवहार पर चलता है ....

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  29. @ भाई सुज्ञ जी ! आपने सायण भाष्य के बारे में श्री अरविंद जी का कथन दिया।
    आभार,
    अब आप मांसाहार के बारे में भी उनके विचार दें और यह भी बताएं कि वे वैदिक यज्ञ में पशु बलि के बारे में क्या विचार रखते थे ?
    धन्यवााद !!!

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  30. @ भाई अनुराग जी ! वेदमंत्र का यह नवीन अर्थ आपने ख़ुद किया है क्या ?

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  31. अनवर जमाल साहब,

    एक बार पुनः टिप्पणी को गहनता से पढ़े और और टिप्पणी के आशय पर केन्द्रित रहें। प्रस्तुत टिप्पणी सायण भाष्य की वस्तुस्थिति को महर्षी अरविंद के शब्दों में स्पष्ट किया गया है। इसका तात्पर्य यह नहीं है सायण की त्रृटि इंगित करने वाले के इन विचारों से इतर विचारों से आंख मूंद कर सहमत हुआ जाय।

    जड़त्व छोडिए, और दोहराव व रटन्त से सार्थक चर्चा की ओर बढ़िए। भारतीय वांग्मय के विद्यार्थी किसी भी व्याख्याकार की अंध भक्ति नहीं करते, जो सही है स्वीकार करते है, पर आंख बंद कर मात्र नाम से ही सहमत नहीं हो जाते।

    विमर्श की उपयोगिता तभी ही है जब साक्ष्य, प्रमाण और तार्किकता युक्तियुक्त हो तो उस पर सहमत होते हुए, उससे आगे के संशयों पर विमर्श हों।

    पूरे लेख और चर्चा का सार यही है कि आर्षवाणी में हिंसा और अहिंसा एक साथ नहीं हो सकती। जहां हर सुक्त में अहिंसा के उपदेश हो, उसी में हिंसा के आचरण का आदेश कैसे हो सकता है। न ग्रंथों में ऐसा विरोधाभासी कथन होता है। अतः यह हिंसा अर्थारोपण किया गया है। ऐसे हिंसक अर्थ मूल सिद्धांतो के ही विपरित है। जो उपदेश ही जन को अहिंसक बनाने के लिए कहे गए हो उनका आशय हिंसक कैसे हो सकता है?

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  32. अनवर जमाल साहब,
    आपने पूछा…
    @ भाई अनुराग जी ! वेदमंत्र का यह नवीन अर्थ आपने ख़ुद किया है क्या ?

    कैसे चर्चाकार हो अनवर भाई? जल्दबाज़ी में भूल गए कि इसी वेदमंत्र के अर्थ को आपने भी प्रस्तुत किया है, अर्थात आप भी ऐसे झूठे अर्थ बना बना कर यहां झूठ भ्रम और दुर्भावना फैला रहे है? आपने स्वयं उस मंत्र के भाष्यकार का सन्दर्भ नहीं दिया है। देते भी कहां से आपके पास हवाले और सन्दर्भ तो होते नहीं है, झूठ प्रसारित करना और सन्दर्भ पूछने पर ठीठता से कहना कि जाकर शंकराचार्य से पूछ लो? क्या यह विद्वानों की चर्चा है?

    आपके इस प्रश्न से यह तो खुलकर सामने आया कि वेद के पवित्र मंत्रों का हिंसक अर्थ करके आप जैसे लोग झूठ फैलाते है।

    रही बात अनुराग जी के अर्थ करने की तो, जान लो कि अनुराग जी बिना साक्ष्य सन्दर्भ के कोई बात नहीं रखते। अनुराग जी नें जो भाष्य प्रस्तुत किया है उनके भाष्यकार की तो मुझे भी जानकारी है और भाष्य यथार्थ अर्थ में प्रस्तुत हुआ है।

    आपके प्रश्न का युक्ति युक्त प्रत्युत्तर अनुराग जी ही प्रस्तुत करेंगे।

    अनुराग जी तो बता देंगे पर अनवर भाई आप अपने झूठ से कैसे बच पाएँगे?

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  33. एक बेहद अच्छी चर्चा .... बौद्धिक आनंद तभी आता है जब सवालों को उसके जवाब मिलते हैं, अहंकारी कुतर्क चित होता है.

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  34. धीरे धीरे देखते चलिए ...
    सच सामने कैसे आता जा रहा है ?

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  35. @ भाई अनुराग जी ! वेदमंत्र का यह नवीन अर्थ आपने ख़ुद किया है क्या ?
    डॉ. जमाल साहब,
    चलिये,अच्छा हुआ कि आपके मुँह से ही यह बात निकल गयी कि वेद की ज्ञान, अहिंसा, कर्म, जनकल्याण, समन्वयीकरण और अन्नदान की मूलभावना पर कुठाराघात करने के लिये किसी संस्थान में संगठित रूप से नवीन और हिंसक अर्थ भी गढे जा रहे हैं। हिन्दी कहावत भी है, चोर की दाढी में तिनका।


    पिछले डेढ-दो हज़ार सालों में जन्मे मज़हबों की केन्द्रीय नियन्त्रण की प्रवृत्ति से हम भारतीय परिचित हैं और इस मजबूरी को अच्छी तरह समझते भी हैं। हमें यह भी पता है कि "सत्यमेव जयते" की सनातन परम्परा में यकीन रखने वाली संस्कृति को जन-सामान्य पर कोई एक विचार, पुस्तक या बलप्रयोग और हिंसा थोपने की आवश्यकता नहीं है। सत्य अपने आप उभरकर सामने आता है। आज संसारभर में कोई खलीफ़ा नहीं है। सार्वभौम राजे, रानी, डिक्टेटर, मिलिट्री रूलर भी एक-एक करके खत्म हो रहे हैं। लेकिन भारतीय समाज में वर्णित और प्रचलित व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गणराज्य पद्धतियाँ दुनिया भर में अपने आप ही अपनायी जा रही हैं। ठीक वही हाल शाकाहार, अहिंसा और करुणा का है। जंगली समाज जितने अधिक सभ्य हो रहे हैं, यह प्रकाश वहाँ भी फैल रहा है।

    जब किसी विकसित अहिंसक सभ्यता पर अल्पविकसित हिसक जंगली समुदाय का आक्रमण होता है तो कई बातें होती हैं, मसलन

    - कुछ कायर सत्य छोड़, असत्य अपनाकर जान बचाते हैं
    - कुछ वीर सत्य के लिये लड़कर मर जाते हैं
    - कुछ वीर और ज्ञानी न केवल बचते हैं, बल्कि अपने ज्ञान से उस जंगली समुदाय को भी प्रकाशित और प्रभावित करते हैं और सम्मान का पात्र बनते हैं। ज़ाहिर है कि कुछ लोग इनसे और उस ज्ञान से कुंठित भी होते हैं। कुछ परम्पराभंजक आदर्श परम्परा को पुनर्परिभाषित करने का लंगड़ा प्रयास भी करते हैं लेकिन वे अपनी सीमाओं को और सत्य के अनंत स्वरूप को नहीं पहचानते।

    लेकिन सत्य यही है कि जैसे रुका हुआ पानी सड़ता है वैसे ही संकीर्ण सीमाओं में जकड़ी परम्परायें ही मरती हैं। "सत्यमेव जयते" की परम्परा "चरैवेति" के सिद्धांत का पालन करते हुए "मृत्योर्मामृतम्गमय" की ओर अग्रसर रहती है। अमृत संस्कृति को न तो मिटने का भय है और न नवीन और हिंसक अर्थ गढने की आवश्यकता। बात किसी एक मंत्र या ग्रंथ की नहीं है। भारतीय अमृत संस्कृति में मृतभोज का महिमामंडन नहीं है यह समझना कठिन नहीं है ।

    बात किसी एक मंत्र या ग्रंथ की नहीं है। भारतीय अमृत संस्कृति में मृत्यु की सहज स्वीकृति तो है परंतु मृतभोज का महिमामंडन नहीं है यह समझना कठिन नहीं है लेकिन गंगा स्नान का आनन्द जलप्रवेश से ही मिलता है दूर बैठकर रेत मसलने से नहीं। जो लोग केवल तर्क,वितर्क,कुतर्क के लिये वेदमंत्रों को पढते हों वे भारतीय संस्कृति के उन वाहकों को कैसे समझेंगे जो वेद के मार्ग पर पिछले कई सहस्र वर्षों से सतत चल रहे हैं

    भारतीय संस्कृति अपने मूल सद्विचारों पर दृढ होते हुए भी नित-नूतन रही है। उसमें तमसो मा ज्योतिर्गमय का सिद्धांत प्रतिपादन के साथ ही बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की मूल भावना बनी रहती है। हमने जिस सत्य को हज़ारों साल पहले पकड़ा, दुनिया आज या कल पकड़ेगी ही| इससे झूठ को बेचैनी होनी स्वाभाविक है
    लेकिन "अहिंसा", जनतंत्र, व्यवस्था, ज्ञान जैसे सत्य तो जन-मानस को प्रकाशित करके ही मानेंगे

    1. सत्य से घृणा करते हुए पूर्ण सत्य को पाया नहीं जा सकता। उसके लिये सत्य की शरण में आना पड़ता है।
    2. जो ऋषि वेदमंत्रों के दृष्टा थे और जो व्यास ज्ञान के संकलनकर्ता थे, उनके हत्यारे कब के दफ़न हो गये, पर ऋषियों का ज्ञान भी जीवित है और उनकी संतति भी। उनके बच्चों को अपनी विरासत साबित करने की आवश्यकता नहींहै। उनके पास तो वह ज्ञान, परम्परा, संस्कार सतत, अनवरत सनातन रूप से न केवल जीवित है बल्कि वे बच्चे आज भी अज्ञानियों को राह दिखाने में सक्षम है।

    जो लोग केवल तर्क,वितर्क,कुतर्क के लिये वेदमंत्रों को पढते हों वे उन्हें कैसे समझेंगे जो वेद के मार्ग पर पिछले हज़ारों साल से सतत चल रहे हैं। संकीर्ण विचारधारा के चश्मे से भारतीय संस्कृति को आंकना ऐसा ही है जैसे कोई कलर-ब्लाइंड रंगीन फ़िल्म देखे।

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    1. चोर की दाढी में तिनका।---वह क्या बात है स्मार्ट जी......
      --- शाकाहार का सबसे बडा सत्य-प्रमाण तो बाइबल की कथा ही है.....ईव ने अडम्स को फ़ल ही क्यों खिलाया.....मांस का टुकडा, मुर्गे की टांग, बकरे का अन्डकोश क्यों नहीं खिलाया....

      हटाएं
    2. सही कहा डॉ श्याम जी

      हटाएं
  36. ... और हाँ, आपसे बात करते-करते यह बताना तो भूल ही गया कि वेदमंत्र का प्रस्तुत अर्थ मेरा नहीं है। यह वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य के मुखारविन्द से उद्धृत है।

    @ अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान् पिबसि त्वमेषाम्।
    पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन्हूयमानः॥
    (ऋग्वेद, मण्डल 10, सूक्त 28, मंत्र 3)

    हे इंद्रदेव! आपके लिये जब यजमान जल्दी जल्दी पत्थर के टुकड़ों पर आनन्दप्रद सोमरस तैयार करते हैं तब आप उसे पीते हैं। हे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव! जब यजमान हविष्य के अन्न से यज्ञ करते हुए शक्तिसम्पन्न हव्य को अग्नि में डालते हैं तब आप उसका सेवन करते हैं।

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  37. 1. संस्कृत वाक की इस आधिकारिक जर्मन वेबसाइट पर वृषभ के 15 अर्थ ऑनलाइन देखे जा सकते हैं:
    सम्भाषणसंस्कृतम् शब्दकोषः
    2. एक अन्य ऑनलाइन शब्दकोष

    उत्तर देंहटाएं
  38. @ आदरणीय भाई अनुराग जी ! पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के वेदानुवाद को देखा तो हमें उसमें यह लिखा हुआ मिला-
    अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान् त्सुन्वन्ति सोमान् पिबसि त्वमेषाम्.
    पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः .
    -ऋग्वेद, 10, 28, 3
    (ऋषि) हे इंद्र ! जब यजमान अभिषव फलकों पर शीघ्रता से हर्षकारी सोम को प्रस्तुत करता है तब तुम उसे पीते हो। उस समय अन्न की कामना करते हुए तुम्हें हवि और स्तुति अर्पित की जाती है।

    आपका दिया हुआ वेदानुवाद इससे भिन्न क्यों है ?
    क्या आप यह बताने की कृपा करेंगे ?

    ### हमने आपसे एक प्रश्न किया और आपने इल्ज़ाम की झड़ी लगा दी ?
    ख़ैर हम आपका आदर करते हैं और बदले में हम आपके लिए वैसे ही शब्द नहीं बोलेंगे।
    हम केवल पोस्ट के विषय पर ही बात करेंगे।

    क्या आप पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के वेदानुवाद को सही और प्रामाणिक मानते हैं ?

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    1. दोनों का अर्थ एक ही है....एक शब्दार्थ है दूसरा विश्वार्थ...आचार्य जी वैदिक अर्थों में वैग्यानिकता व प्राक्रतिक अर्थ समाहित करते हैं..

      हटाएं
  39. @आपका दिया हुआ वेदानुवाद इससे भिन्न क्यों है ? क्या आप यह बताने की कृपा करेंगे ?

    आपने कागज़ पर छपा/सम्पादित/पढा उधृत किया है, मैने मुख से कहा और कानों से सुना उद्धृत किया है। यदि हमें वेद के आशय में शंका होती तो शायद हम भी छपे हुए कागज़ ढूंढ रहे होते।

    @क्या आप पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के वेदानुवाद को सही और प्रामाणिक मानते हैं ?
    मेरे या आपके मानने न मानने से न सत्य बदलेगा और न वेद की सनातन परम्परा। जैसा मैने पहले कहा कि भारतीय परम्परा आग्रह की नहीं, समझ की है। हज़ारों साल तक वेदवाणी और उसके उपदेश को सम्भालने, पालन करने, और हम तक लाने वालों पर शक़ करने की कोई वजह नहीं है। उनका आचरण ही वेद के मन्तव्य का इशारा है। आपका आभार कि आपने भारतीय संस्कृति के अहिंसक मन्तव्य के विपरीत लगने वाली शंकायें यहाँ रखीं और इस बहाने आपके हाइलाइट किये शब्दों के उपयुक्त अर्थ भी सामने आये हैं और आपके उद्धृत मत्रों के अनुवाद भी।

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  40. डा. अनवर जमाल साहब ने अपनी टिप्पणियों में वैदिक सभ्यता का वह पक्ष भी यहां रख दिया है जिसे आम तौर पर शाकाहारी सामने आने नहीं देना चाहते।
    इस से चर्चा की क्वालिटी में इज़ाफ़ा हुआ है और पता चला है कि असल बात को कैसे बदलने की कोशिश की गई है ?

    हम पिछली पोस्ट पर भी दो-तीन टिप्पणियां कर चुके हैं मगर उन्हें पब्लिश होने के बाद हटा दिया गया।
    यह तो कोई अच्छी बात नहीं है कि अपने पक्ष के हरेक तरह के आदमी की टिप्पणियां प्रकाशित की जाएं चाहे उसमें ऐसी बात भी हो जिसे औरतें पढ़ते हुए शर्म महसूस करें और हमारी ठीक ठाक टिप्पणियां भी हटा दी जाएं।

    इसे हटाना मत,
    वर्ना इसे कहीं और दिखाया जाएगा और वह आपको पसंद न आएगा।

    उत्तर देंहटाएं
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    1. अयाज जी...अनवर जमाल ने कोई पक्ष नही रखा है..अपितु भ्रमित अर्थ लिये हुए घूमरहे हैं..सभी ने लानत भेजी है....आप अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रहे हैं...

      हटाएं
    2. आप लोग आर्य समाज के भाष्यो से इतना क्यों डरते हैं ?
      वेद आचार्यो के बस कि बात नहीं | कोई भी सामान्य संस्कृत जानने वाला अगर वेद का अनुवाद करे तो बिना अर्थ कि बाते बनेगी | क्यों के उसके ज्ञान का स्तर इतना हैं हि नहीं | क्यों कि कुरान मांसाहार बढ़ाती हैं सिर्फ इसलिए आपलोगों को तकलीफ हो रही हैं के वेद कैसे मानवता कि बात कर रहे हैं | महर्षि दयानंद कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्यान करिये द्वेष रहित होकर समझ आजाएगा | धन्यवाद

      हटाएं
  41. जमाल साहेब पहले लांछन लगाने की कुबुद्धि का त्याग कीजिये तब वेदार्थ ही नहीं मानाव जीवन का अर्थ भी समझ में आयेगा.
    वोह कहते है ना की 'थोथा चना बाजे घना' .............. वैसे मत बनिए. अनुरागजी के बताये और आपके दर्शाए में कहाँ भाव-विभेद है ज़रा बताइए तो ???
    अनुराग जी के लिखे पत्थर और आपके दर्शाए अभिषव फलक दोनों ही अभिषव कर्म के अंगीभूत है जिसका आशय सोमलता को पत्थर पर चटनी के भांति पीसकर वस्त्र से छानकर मंथन किया हुआ दही मिलाकर तैयार करना होता है.
    आप उस परम्परा के अनुगामी हैं जहाँ लिखे हुए को बिना अपनी बुद्धि लगाए भेड़-चाल से अनुगमन करने का आदेश है, जबकि वैदिक मार्ग ज्ञान को अनुभवगम्य अनुगमन करने की स्वतन्त्रता देता है.
    इसलिए दोष आपका नहीं है की आप सद्शास्त्रों में अपनी सोची बात आरोपित करने का उपक्रम करतें है.
    अब आप को तो शायद यह भी नहीं पता होगा की वेदों में, गीता में या उपनिषदों में "यज्ञ" किस कर्म के लिए आया है, जो स्थूल अर्थ आपकी स्थूल बुद्धि में गम्य हुआ है उसी के अनुसार भी जब आपकी तिकड़में भ्रष्ट है तो वैदिक दर्शन के "यज्ञ-कर्म" के सन्दर्भ में तो आप जैसे वेदों आदि में हिंसा-मांसाहार सिद्ध करने वालों की बुद्धि पर तरस आता है.
    परमेश्वर ने इस पावन ज्ञान से आप लोगों को वंचित क्यों रखा है. बात किसी मुसलमान या इसाई की नहीं है , बात हम सभी की हैं जो वैदिक ज्ञान को ठीक से नहीं समझ सकें है. चाहे आजके हिन्दू हों या अन्यधर्मी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि वेदों में तो इस तरह के उपासना विभेद का कोई वर्णन नहीं है.
    जो विभेद सुर-असुर का किया है उसी सन्दर्भ में यह बात कह रहा हूँ की जो वेद निर्देशित करुणा, अहिंसा, विश्वबंधुत्व, त्याग, संयम आदि के पथ पर अधिकाधिक चलने का उपक्रम करता है वह तो वेद ज्ञान के प्रकाश से पूत सुर है और जो वेदज्ञान के प्रकाश को नकार कर उलजुलूल स्थापना का प्रयास करतें है वे कुपंथी असुर हैं . निच्शित हमें ही करना है की हम सुर बनेंगे या असुर.

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  42. @ आदरणीय भाई अनुराग शर्मा जी ! आपने पंडित श्री राम शर्मा आचार्य जी के मुख से वेदानुवाद सुना, अच्छा किया लेकिन जो कुछ आपने सुना है वह केवल आप तक ही रहेगा जबकि जो वेदानुवाद आचार्य जी ने प्रकाशित किया है। उसका लाभ सबको मिल रहा है। हमारी ख़ुशक़िस्मी यह है कि हमारे पास उनका प्रामाणिक किताबी वेद-अनुवाद भी है और आप जैसा भाई भी है, जिसने उनके श्रीमुख से भी वेदानुवाद सुना है और उसे उनके वेदानुवाद पर कोई शंका और संशय भी नहीं है।
    हम यहां पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के वेदानुवाद के दो मंत्रों को आपकी मदद से समझने की कोशिश करेंगे-
    # पहला मंत्र

    क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः।
    इहवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्।।

    अर्थात मांस भक्षक अग्नि जिनके स्वामी यम हैं, उन्हीं का सामीप्य प्राप्त करें। जो अग्नि यहां हैं, वे ही हमारी हवियों को देवताओं के पास पहुंचावें।
    -ऋग्वेद, 10, 16, 9

    ‘अग्नि‘ को इस मंत्र का देवता बताया गया है और इस मंत्र में अग्नि को स्पष्ट रूप से मांस भक्षक कहा गया है।

    ## दूसरा मंत्र

    इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
    यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् त्सो अंग वेद यहि वा न वेद ।।

    अर्थात यह विभिन्न सृष्टियां किस प्रकार हुईं ? इन्हें किसने रचा ? इन सृष्टियों के जो स्वामी हैं वह दिव्यधाम में निवास करते हैं, वही इनकी रचना के विषय से जानते हैं, यह भी संभव है कि उन्हें भी यह सब बातें ज्ञात न हों।
    -ऋग्वेद, 10, 129, 7

    इन मंत्रों के बारे में आपने पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के मुख से कुछ सुना हो तो आप इस विषय में बताने की कृपा करें !

    क्या परमेश्वर के बारे में यह मान लेना ठीक होगा कि वह सारी सृष्टियों का स्वामी तो है लेकिन हो सकता है कि
    ‘उन्हें भी यह सब बातें ज्ञात न हों ?‘


    -----------------------
    @@ प्रिय बंधु अमित शर्मा जी ! आपने ऋग्वेद 10, 28, 3 के पूरे अनुवाद का मिलान किया होता तो आप जान लेते कि ‘पचन्ति ते वृषभां‘ का जो अर्थ प्रकाशित वेदानुवाद में किया गया है, उसमें वृषभ का अर्थ नहीं मिल पा रहा है और आपने भी उसे गोल कर दिया है। इसके बाद आप व्यक्तिगत आक्षेप पर उतर आए।
    तर्क न हो तो कोई बात नहीं है,
    साफ़ स्वीकारने में क्या हर्ज है ?
    पता आपको भी है कि हमारा आपका संबंध ऐसे ही टूटने वाला तो है नहीं,
    हमें आपकी मुस्कान शुरू से ही प्यारी लगती है।

    ख़ैर, इस टिप्पणी में दिए गए मंत्रों पर आप भी विचार करके हमारा ज्ञानवर्धन कीजिए,
    हम आपके आभारी रहेंगे।

    आप दोनों साहिबान का बहुत बहुत शुक्रिया !

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    उत्तर
    1. I send afar flesh eating Agni, bearing off stains may he depart to Yama's subjects.
      But let this other Jātavedas carry oblation to the Gods, for he is skilful.

      Griffit mahoday iska anuvaad ye karte hai

      हटाएं
  43. @ Dr. Ayaz Ahmad

    डा. अनवर जमाल साहब ने अपनी मिथ्या(असन्दर्भित) टिप्पणियों से वैदिक सभ्यता पर हिंसा का कुत्सित आरोपण ही किया है। और सभी को अपनी ही तरह मांसभक्षी दर्शाने का असफल प्रयास किया है जिसका अन्य विद्वान प्रमाण और मूल सिद्धांत की भावना को बार बार उद्घाटित कर, हिंसाचार दुराग्रह को स्पष्ट रूप से वेदों से दूर ही किया है।

    इस या पिछली पोस्ट से आपकी कोई भी टिप्पणी न तो हटाई गई न अभी तक अप्रकाशित रखी गई है। निरामिष ब्लॉग स्वयं चाहता है आप और डॉ अनवर जमाल जैसे लोग अवश्य इस चर्चा में हिस्सा ले और अपने मांसाचार, हिंसाचार की उपादेयता पर अपने विचार रखे। हम स्पष्टता से मानते प्रबुद्ध पाठक वर्ग स्वयंमेव नीर क्षीर विभाजन कर लेगा।
    निरामिष ब्लॉग दृढता से इस बात में विश्वास रखता है कि मांसाहार किसी के भी जीवन में अपरिहार्य नहीं है। फिर करूणावान सभी जीवों का कल्याण चाहने वाले परमेश्वर की वाणी वेद में हिंसाचार को आचरणीय कैसे बताया जा सकता है?

    आपकी टिप्पणी यहां प्रकाशित करने के बाद भी आप इसे चाहें वहां प्रकाशित कर सकते है, हां निरामिष के लेख और उसपे आई टिप्पणीयां निरामिष की सामग्री है, बिना अनुमति इसे प्रकाशित करना चोरी है। अनुमति मात्र लेकर इसे साभार कहीं भी प्रकाशित किया जा सकता है। बस इस शर्त के साथ कि इनका प्रयोग ज़हर उगलने, नफ़रतें फैलानें और निंदा करने के लिए नहीं किया जाएगा।

    उत्तर देंहटाएं
  44. @ क्रव्यादमग्निं प्र हिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः।
    इहवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्।।

    अर्थात मांस भक्षक अग्नि जिनके स्वामी यम हैं, उन्हीं का सामीप्य प्राप्त करें। जो अग्नि यहां हैं, वे ही हमारी हवियों को देवताओं के पास पहुंचावें।
    -ऋग्वेद, 10, 16, ९

    जमाल साहेब इसीलिए तो कहता हूँ की जब तक हम सभी स्थूल बुद्धि से ही समझने का प्रयास करेंगे तो कुछ समझने में नहीं आयेगा.
    मांस भक्षक अग्नि जिनके स्वामी यम हैं इसमें तो सीधा सीधा अर्थ प्रकाशित है की जो अग्नि चिता पर मांस को जलाती है उसे "क्रव्याद" यानी मांस भक्षक अग्नि कहते हैं वह अपने स्वामी यम जो की मृत्यु के देवता हैं के पास ही रहें. और जो अग्नि इस यज्ञकर्म की अग्नि "हव्यवाहिनी" अग्नि यहाँ है वे ही हमारी हवियों को देवताओं के पास पहुंचावें।
    अर्थात क्रव्याद अग्नि इस यज्ञकर्म से दूर रहें .
    आप शायद पोस्ट को भी ध्यान से नहीं पढतें है इस पोस्ट में ही साफ़ साफ़ लिखा है -----
    सभी जानतें है की यज्ञ कर्म में भूल से भी कोई कर्मी-कीट अग्नि से मर ना जाये इसके लिए अनेक सावधानियां बरती जाती है. वेदी पर जब अग्नि की स्थापना होती है तो उसमें से थोड़ी सी आग निकालकर बाहर रख दी जाती है की कहीं उसमें 'क्रव्याद' (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली आग ) के परमाणु न मिल गएँ हो, इसके लिए 'क्रव्यादांशं त्यक्त्वा' होम की विधि है.

    जमाल साहेब मैंने सिर्फ पत्थर के टुकड़े और अभिषव फलकों का निराकरण किया है. इत्निसी बात क्यों नहीं समझे :))

    इसी लिए मैं भी कह रहा हूँ की तर्क न हो तो कोई बात नहीं है, साफ़ स्वीकारने में क्या हर्ज है ? की आप साफ़ बात को नहीं स्वीकारने की शपथ खाकर सिर्फ कीचड़ उछालने के लिए ही प्रयासरत हैं.

    दूसरे मंत्र के बारे में बाद में बात होगी पहले आप प्रथम मंत्र का जो अनर्थकारी अर्थ आपके समझ में आया और जो निराकरण आपके सामने आया है उससे सहमत हैं या नहीं यह बताइए .

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  45. @ भाई सुज्ञ जी ! आपने कहा है कि
    ‘मांसाहार किसी के भी जीवन में अपरिहार्य नहीं है।‘
    इस संबंध में ‘साइंस ब्लॉगर्स आफ़ इंडिया‘ की ताज़ा पोस्ट पर बताया गया है कि
    शरीर का ढांचा हड्डियों पर खड़ा है और हड्डियों के लिए ज़रूरी तत्वों में से एक है ‘विटामिन डी‘।
    शाकाहारी खुराक से विटामिन डी की आपूर्ति नहीं हो पाती है.
    फिश तथा फिश आयल (तेल वाली मछली, मछली का तेल), विटामिन डी सम्पूर्ण तथा इससे पुष्टिकृत खाद्य विटामिन डी का स्रोत हैं. यदि धूप नहीं खाते हैं आप या कमतर एक्सपोज़र मिलता है सन का तब इन्हें आजमाएं.
    देखें यह पोस्ट:
    ...क्‍या आपको अपनी हड्डियों का मिजाज़ मालूम है?
    ♠ ♥ आप विज्ञान और सत्य के विरूद्ध कोई विश्वास रखना चाहते हैं तो आप स्वतंत्र हैं।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अरे साइन्स ब्लोगर आफ़ इन्डिआ ...वही ज़ाकिर भाई का ही तो नहीं जो विग्यान से ही अनभिग्य ...और हर बात पर विग्यान विग्यान चिल्लाते हैं..

      हटाएं
  46. @ प्रिय अमित जी ! आपका मत हमारे सामने आ गया है,
    ज़रा अन्य विद्वानों की टिप्पणियां भी आ जाएं तो फिर हम इस पर अपनी राय देंगे,
    इंशा अल्लाह !

    उत्तर देंहटाएं
  47. @ शाकाहारी खुराक से विटामिन डी की आपूर्ति नहीं हो पाती है.

    अनवर जमाल साहब,

    कोई पूर्वाग्रही छद्म वैज्ञानिक ही ऐसी वाक्य रचना कर सकता है।

    क्योंकि आज सभी जानते है विटामिन डी का प्राईम स्रोत सूर्य-प्रकाश है। फिर भी दुग्ध-उत्पाद में प्रधानता से विटामिन डी पाया जाता है।


    आगे आप और आपका वैज्ञानिक चुपके से कराहते है………

    @ यदि धूप नहीं खाते हैं आप या कमतर एक्सपोज़र मिलता है सन का तब इन्हें आजमाएं.

    हम कहते हैं, धूप से आपको केल्शियम सोखने के लिए पर्याप्त विटामिन डी मिल जाता है, तथापि आप दुग्ध उत्पादों को अपने भोजन में रखते ही है। मात्र आजमाने के लिए तुच्छ मांसाहार की तरफ जाने की जरूरत नहीं, फिर भी शरीर में बडी नॉर्मल सी मात्रा की जरूरत पड भी जाय तो उस की प्रतिपूर्ती आप औषध से भी कर सकते है।

    एक बार फिर से देखें वह पंक्ति!!!, यह मांसभक्षियों के भ्रमजाल युक्त विज्ञापन से अधिक क्या है?

    उत्तर देंहटाएं
  48. DR. ANWER JAMAL ने कहा…
    @शाकाहारी खुराक से विटामिन डी की आपूर्ति नहीं हो पाती है.
    एकदम भ्रामक कथन. ऊपर "निरामिष" की टिप्पणी पढिये और आज से ही इस अज्ञान को त्याग दीजिये। मांसाहारियों में भी विटामिन डी की कमी के बहुत से केस पाये जाते हैं। सौर किरणे हमारी त्वचा के संसर्ग में आकर विटामिन डी का निर्माण करती हैं। वैसे दूध और उसके उत्पाद में भी विटामिन डी बहुतायत में होता है।

    आपकी विटामिन बी की आशंका का निराकरण इसी ब्लॉग पर पहले ही किया जा चुका है और अब विटामिन डी की आपकी आशंका भी हल हो गयी है। वेदपालक ब्राह्मणोंके जीवन से प्रेरणा लेकर आप सात्विक शाकाहारी भोजन आरम्भ करेंगे तो आपकी इस प्रकार की कमियों की आशंका समाप्त हो जायेगी। तो कब शुरू कर कर रहे हैं आप शाकाहार समर्थन अभियान?

    उत्तर देंहटाएं
  49. DR. ANWER JAMAL ने कहा…
    @हमारी ख़ुशक़िस्मी यह है कि हमारे पास उनका प्रामाणिक किताबी वेद-अनुवाद भी है और आप जैसा भाई भी है, जिसने उनके श्रीमुख से भी वेदानुवाद सुना है और उसे उनके वेदानुवाद पर कोई शंका और संशय भी नहीं है।

    पिछले मंत्रों के बारे में आपकी शंका मिट गयी है, अच्छा हुआ। अज्ञानवश उन मंत्रों के साथ जो भी व्यवहार हुआ हो, आशा है कि अब उनका सही और भारतीय संस्कृति और महान अहिंसक परम्परा के अनुकूल अर्थ मिल जाने के बाद आप हिंसा के प्रचार से बच सकेंगे, शुभकामनायें।

    @ प्रिय अमित जी ! आपका मत हमारे सामने आ गया है,

    मंत्र की व्याख्या अमित जी ने फिर से कर दी है। स्पष्ट है कि मंत्र का अभिमत ही अमित जी का मत है। "भारतीय संस्कृति में मांस भक्षण?" आलेख में मैं भी वही अभिप्राय आपके सामने रख चुका हूँ। अग्नि देवों का हव्य और पितरों का कव्य, यह दोनों ही ले जाने का माध्यम है। देवों व पितरों के लिये यज्ञ के अन्न और अन्न के पिंड तो अग्नि स्वीकारती ही है हमारी मृत देह भी ही उसे समर्पित होती हैं। उपरोक्त मंत्र में बस यही स्पष्ट किया है कि यज्ञकुण्ड की अग्नि श्मशान की अग्नि से भिन्न है। श्मशान की अग्नि यम की है। भारत में रहते हुए भी यदि किसी का आज तक इन दोनों ही प्राचीन परम्पराओं से परिचय न हो तो आश्चर्य की बात है।

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  50. अयाज़ जी,
    विषय से इतर बात है परंतु बताना आवश्यक है कि टिप्पणियों की समस्या इस समय ब्लॉगर प्लेटफ़ॉर्म पर सर्वव्यापक है। यह किसी ब्लॉग विशेष की नहीं बल्कि गूगल की तकनीकी समस्या है। न केवल टिप्पणियाँ स्पैम में जा रही हैं बल्कि बहुत से केस में - और यह व्यवहार मैने अपनी टिप्पणियों के साथ कई ब्लॉग्स पर देखा है - प्रकाशित होने के बाद भी गायब हो जा रही हैं।

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  51. @@ आदरणीय भाई अनुराग शर्मा जी व प्रिय बंधु अमित शर्मा जी !
    कृप्या ध्यान दें कि हमने यह भी पूछा है कि ‘पचन्ति ते वृषभां‘ का जो अर्थ प्रकाशित वेदानुवाद में किया गया है, उसमें वृषभ का अर्थ नहीं मिल पा रहा है और आपने भी उसे गोल कर दिया है।
    इसी के साथ हमने यह भी पूछा था कि
    इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न ।
    यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन् त्सो अंग वेद यहि वा न वेद ।।

    अर्थात यह विभिन्न सृष्टियां किस प्रकार हुईं ? इन्हें किसने रचा ? इन सृष्टियों के जो स्वामी हैं वह दिव्यधाम में निवास करते हैं, वही इनकी रचना के विषय से जानते हैं, यह भी संभव है कि उन्हें भी यह सब बातें ज्ञात न हों।
    -ऋग्वेद, 10, 129, 7

    इन मंत्रों के बारे में आपने पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के मुख से कुछ सुना हो तो आप इस विषय में बताने की कृपा करें !

    क्या परमेश्वर के बारे में यह मान लेना ठीक होगा कि वह सारी सृष्टियों का स्वामी तो है लेकिन हो सकता है कि
    ‘उन्हें भी यह सब बातें ज्ञात न हों ?‘
    जब आप बता ही रहे हैं तो इनके बारे में भी अपना मत बता दीजिए ताकि फिर पूरी तरह से हम आपके जवाब की समीक्षा कर सकें और बात आगे बढ़े।

    आभार !

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  52. आदरणीय जमाल साहब यह ब्लॉग शाकाहार के प्रचार -प्रसार के लिए है, और तद्विषयक पोस्टें यहाँ प्रकाशित हो रही है. अब जब आपने वेदों में मांसाहार आरोपित किया है और आपको समुचित निराकरण भी मिल रहें है तो मैदान क्यों कर छोड़ रहें है ???? चर्चा वेदों में शाकाहार-मांसाहार से हटा कर ; नासदियसूक्त की गहनज्ञान गुहा में क्योंकर ले जाना चाह रहें है ???? समाधान तो इसका भी समुचित है आपके लिए पर एक विषय तो पहले पूरा कीजिये वेदों में मांसाहार को तो सिद्ध कीजिये !!!

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  53. और जो आप "‘पचन्ति ते वृषभां" का अर्थ नहीं समझ पायें तो बात पक्की है की कभी समझ भी नहीं पायेंगे क्योंकि आप सिर्फ अनर्गल आक्षेप लगाने के लिए ही नाम-साम्य प्रकरण ढूंढने/उठाने का उद्योग करतें है; लेकिन सन्दर्भ से काटकर. जब पूरा प्रकरण ही इन्द्र के बल-वर्णन स्तुति के लिये है, तो यहाँ स्पष्ठ है की बलकारक सोमरस के साथ बलकारक ऋषभकंद का ही उल्लेख है, सांड/बैल के मांस का नहीं.

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  54. @ प्रिय बंधु अमित शर्मा जी ! नासदीय सूक्त के बारे में हमने भाई अनुराग जी से इसलिए पूछा था कि हो सकता है उन्होंने पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के मुख से इस मंत्र के बारे में कुछ सुना हो ?
    उनके उत्तर की हम प्रतीक्षा कर रहे हैं।
    आपने बताया है कि ऋग्वेद 10, 28, 3 में ‘वृषभ‘ से तात्पर्य बैल न होकर ‘ऋषभकंद‘ है।
    आपने इस मंत्र से क्या अर्थ ग्रहण किया है यह अलग बात है,
    हमने यहां पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी का मत जानना चाहा था क्योंकि उन्होंने मंत्र के अनुवाद में न तो बैल का ज़िक्र किया है और न ही ऋषभकंद का। हो सकता है कि पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी इस मंत्र का अनुवाद करते समय ‘ऋषभ‘ शब्द का अनुवाद करना भूल गए हों।
    ख़ैर, आप ऋषभकंद के बारे में ही कुछ जानकारी दीजिए,
    यह क्या होता है और यज्ञ सामग्री में इसका क्या उपयोग किया जाता है ?
    क्या इसके पैर, आंखें और पसलियां आदि भी होती हैं ?
    यज्ञ में पशुओं के साथ व्यवहार

    उदीचीनां अस्य पदो निधत्तात् सूर्यं चक्षुर्गमयताद् वातं प्राणमन्ववसृजताद्.
    अंतरिक्षमसुं दिशः श्रोत्रं पृथिवीं शरीरमित्येष्वेवैनं तल्लोकेष्वादधाति.

    एकषाऽस्य त्वचमाछ्य तात्पुरा नाभ्या अपि शसो वपामुत्खिदता दंतरेवोष्माणं
    वारयध्वादिति पशुष्वेव तत् प्राणान् दधाति.

    श्येनमस्य वक्षः कृणुतात् प्रशसा बाहू शला दोषणी कश्यपेवांसाच्छिद्रे श्रोणी
    कवषोरूस्रेकपर्णाऽष्ठीवन्ता षड्विंशतिरस्य वड्. क्रयस्ता अनुष्ठ्योच्च्यावयताद्. गात्रं गात्रमस्यानूनं कृणुतादित्यंगान्येवास्य तद् गात्राणि प्रीणाति...ऊवध्यगोहं पार्थिवं खनताद् ...अस्ना रक्षः संसृजतादित्याह.
    -ऐतरेय ब्राह्मण 6,7
    अर्थात इस पशु के पैर उत्तर की ओर मोड़ो, इस की आंखें सूर्य को, इस के श्वास वायु को, इस का जीवन (प्राण) अंतरिक्ष को, इस की श्रवणशक्ति दिशाओं को और इस का शरीर पृथ्वी को सौंप दो. इस प्रकार होता (पुरोहित) इसे (पशु को) दूसरे लोकों से जोड़ देता है. सारी चमड़ी बिना काटे उतार लो. नाभि को काटने से पहले आंतों के ऊपर की झिल्ली की तह को चीर डालो. इस प्रकार का वह पुरोहित पशुओं में श्वास डालता है. इस की छाती का एक टुकड़ा बाज की शक्ल का, अगले बाज़ुओं के कुल्हाड़ी की शक्ल के दो टुकड़े, अगले पांव के धान की बालों की शक्ल के दो टुकड़े, कमर के नीचे का अटूट हिस्सा, ढाल की शक्ल के जांघ के दो टुकड़े और 26 पसलियां सब क्रमशः निकाल लिए जाएं. इसके प्रत्येक अंग को सुरक्षित रखा जाए, इस प्रकार वह उस के सारे अंगों को लाभ पहुंचाता है. इस का गोबर छिपाने के लिए जमीन में एक गड्ढा खोदें. प्रेतात्माओं को रक्त दें.

    अब आप ख़ुद देख सकते हैं कि यह पशु का वर्णन है या किसी औषधि का ?
    वह कौन सी औषधि है जिसके पैर , आंखें और 26 पसलियां हों ?

    -------------------

    @@ क्या भाई अनुराग शर्मा जी अमित जी से सहमत हैं कि वृषभ का अर्थ ऋषभकंद ही है या उनका नज़रिया कुछ और है ?
    कृप्या जानकारी दें !

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  55. डॉ अनवर जमाल साहब,

    सबसे पहले तो आपने निवेदन है, बात को अनावश्यक फैलाएं नहीं, और न विषयान्तर करने का प्रयत्न करें।

    1-आपने पहले भी आपने वेदमंत्रों के हिंसामूलक अर्थ प्रस्तुत किए है। और ‘सन्दर्भ’ पूछने पर आप मौन है। पता तो चले यह कौन लोग है जो वेदों में हिंसा आरोपित करते है। आप और आपके संस्थान का ऐसे प्रचार में क्या हित है? आपने शंकराचार्य पर वैदिक यज्ञों में पशुबलि का आरोप लगाया, आपके इस कथन का स्रोत क्या है? आप बता सकते है, शंकराचार्य यज्ञ निर्दोष करवाते है या हिंसार्थक? शंकराचार्य का आहार कौनसा है?

    2-यहां संस्कृत की पाठशाला नहीं चल रही, पहले ही बता चुके है कि वेदिक संस्कृत और उसका अर्थाभिगम दुर्लभ है। पहले आप लौकिक संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर लें। फिर वैदिक संस्कृत को किसी विद्वान का समर्पण भाव से शिष्यत्व ग्रहण कर सीखें। अर्थाभिगम तो आपकी मेघा पर निर्भर करेगा। वृषभ के अनेकार्थी (यह लिंक देखें: संभाषण संस्कृतं पर वृषभ शब्द) सहित सापेक्ष अर्थ के प्रयोग पर अमित जी और अनुराग जी स्पष्ट करते रहे है। फिर भी श्रीराम शर्मा प्रकाशित वेदानुवाद की यह प्रतिलिपि (यह लिंक देखें: पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा किये वेदमंत्र की छपी हुई प्रति)
    देखें, यहां वृषभ शब्द गोल नहीं हुआ है, सही अर्थ में प्रस्तुत हुआ है, यदि इस प्रकार अध्ययन भी नहीं कर सकते तो सार्थक अर्थ कैसे समझ पाएंगे?

    और अब ऋग्वेद के शब्द व्यवहार पर, कुदकर ऐतरेय ब्राह्मण का सन्दर्भ क्यों?

    3-ईश्वर की परिभाषा पूछ कर यहां विषयान्तर चेष्टा न करें।

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  56. @ @ भाई सुज्ञ जी ! आदरणीय शंकराचार्य जी के बारे में भी बताया जाएगा और जहां से बताया जाएगा , उसका हवाला भी दिया जाएगा लेकिन आप थोड़ा धीरज तो धरें और जिससे जो बात चल रही है, उसमें दख़ल देकर ख़लल न डालें।
    उपरोक्त टिप्पणी में आपको मुख़ातिब नहीं किया गया है और वृषभ के अर्थ पर बात चल रही है।
    हम नहीं समझ पाएंगे ,
    यह तय करने वाले आप कौन हैं ?
    वैसे भी हम अपने बल पर समझने का दावा कर ही कब रहे हैं भाई ?
    हम तो आप सबसे यह कह रहे हैं कि वैदिक यज्ञ में पशुओं की बलि के बारे में वैदिक विद्वान हमेशा से जानकारी रखते हैं।

    बीच में बोलकर ख़लल डालना लाज़िमी था क्या ?
    बात का तारतम्य ही भंग हो गया।

    हां, तो अमित जी और भाई अनुराग जी हम आपके जवाब की प्रतीक्षा में हैं और फिर कुछ टिप्पणियों के बाद हम बताएंगे शंकराचार्य जी का मत।

    धन्यवाद !

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    1. देखो डाक्टर साहब अल्लाह ने तो ये भी कहा है कि दया भाव रखो पर बकरीद पर वो दया भाव कहा चला जाता है, जब बकरे को काटना तुम लोग पुण्य समझते हो। और हमारे गिरेबान मे झाकने से पहले उन्हे समझाआो जो अल्लाह के नाम पर कत्लेआम करते फिरते है। हम लोग शांकि व्यवस्था का समर्थन कर रहे,है और तुम तब से मारकाट का समर्थन कर रहे हो। अब मुझे समझ आ गया कि आतंकवादी कहाँ से आते है। बुरा मत मानना आपके विचारो को पढ़ने के बाद ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा। क्योकि यहाँ पर किसी हिनदू ने मारकाट का समर्थन नही किया। पर आप उसी का समर्थन कर रहे है। जो बकरीद पर बकरा काट सकता है निर्दयी होकर,अल्लाह के नाम से वो तो फिर, उसके लिए कफिरो को मारना भी पुण्य ही हुआ। मुझे मेरे एक मुस्लिम मित्र ने ही बताया था कि कैसे हाफिज लोग मुस्लिमो को काफिर(हिन्दू) के खिलाफ भड़काते है, और वो आज भी मुस्लिम है,पर माँसाहारी नही रहा। समझ गयें आप या और कुछ भी बताऊ, क्योकि जहाँ तक मै जानता हूँ, आप जानते होंगे ये सब पर कभी नही कुबूल करेंगे। और JNU का केस इसका एक सीधा सा प्रमाण है, जहाँ हिन्दुस्तान मुर्दाबाद के नारे लगायें गये।
      कट्टर हम भी है,पर उससे किसी अन्य को नुकसान नही पहुचता है।

      हटाएं
    2. और न ही हम अपने देश जहाँ पढ़ लिखें खाया पिया उसके मुर्दाबाद के नारे लगाते है। ये सब छ&#