मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

अहिंसा का शुभारंभ आहार से, अहिंसक आहार शाकाहार से

शाकाहार विरोधी अक्सर यह वितंडा खड़ी करते है कि पशुओं के प्रति अहिंसा से पहले मानव के प्रति होने वाली हिंसा को रोको। जानवरों की बात तो बाद में कर लेना। लेकिन क्या यह कभी सम्भव है कि मानवता के प्रति पूर्ण अहिंसा और शान्ति स्थापित हो ही जाय? और तब तक हम क्रूर बन जीवहिंसा करते ही रहें? वस्तुतः मानवों के प्रति भी अहिंसा में बाधक तो स्वयं मानव ही है। उसमें वे सभी दुर्गुण है- क्रोध, द्वेष, गंदी प्रतिस्पृधा और प्रतिशोध की क्रूरतम भावना, जो उसके हिंसक भावों को खाद देते है। जब तक वे दुर्भावनाएँ दूर नहीं होती, शान्ति सम्भव ही नहीं। उन्ही दुर्भावों को पनपने से रोकने के लिये ही मानव मन में सम्वेदनाएँ और करूणा जगना जरूरी है। जीव-जानवर मात्र के प्रति दया भाव होगा तभी हमारे हृदय में कोमल-करूण भाव जगह बना पाएंगे। छोटे से छोटे जीवन के प्रति सम्वेदना होगी तभी शुभ भावो को हृदय में संरक्षण प्राप्त होगा। ऐसे शुभ भाव, अहिंसा को सुक्ष्म चरम तक ले जाने पर ही मनोवृति में स्थायित्व पा सकेंगे।

मानव के साथ तो होने वाली हिंसाएं, उसके ही आपसी द्वेष, क्रोध और मोह का परिणाम होती है। किन्तु निरिह निर्दोष जीव के साथ हमारे आपसी प्रतिस्पृधात्मक रिश्ते नहीं होते। और न ही उसके साथ हमारे सम्बंध उस तरह बिगडते है। फिर इन निरपराधी प्राणियों के साथ हिंसक व्यवहार क्यों किया जाय। भोजन और पोषण तो हम शाकाहार से भी पूर्णरूपेण प्राप्त कर सकते है, फ़िर मात्र स्वाद-लोलूपता के लिये, निर्दोष प्राणियों को प्राणदंड क्यों दिया जाय?

मै तो समझता हूँ मानव को अपने कोमल-करूण भावों में अभिवृद्धि के लिये और मनोवृति को शान्त सात्विक बनाने के लिये, अहिंसा को निश्चित ही ‘जीवदया’ से प्रारंभ करना होगा। निष्ठुरता के चलते दया प्रगाढ़ नहीं बन सकती। इतने निर्मल कोमल शुभभाव कि अहिंसा अपने चरम पर पहूँच जाय। तभी मानव जीवन में शान्ति प्रवेश सम्भव है। जो अन्ततः परस्पर मानव सम्बंधो से भी क्रूरता व आतंक दूर करने का आधार बन सकते है।

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

माँस हिंसा का मूल और 'महाहिंसा' का कारण !!

माँस हिंसामूल जगुप्साप्रेरक

हिंसामूलमध्यमास्पदमल ध्यानस्थ 
रौद्रस्य यदविभत्स, रूधिराविल कृमिगृह 
दुर्गन्धिपूयदिकम्। शुक्रास्रक्रप्रभव 
नितांतमलिनम् सदभि सदा निंदितम्, 
को भुड्क्ते नरकाय राक्षससमो 
मासं तदात्मद्रुहम्॥               (संदर्भ अज्ञात)
अर्थात्:

माँस हिंसा का मूल, हिंसा करने पर ही निष्पन्न होता है। अपवित्र है। और रौद्र (क्रूरता) का कारण है। देखने में विभत्स, रक्तसना होता है। कृमियों व सुक्षम जंतुओं का घर है। दुर्गंधयुक्त मवाद वाला, शुक्र-शोणित से उत्पन्न, अत्यंत मलिन व सत्पुरुषों द्वारा निंदित है। भला कौन इसका भक्षण कर, राक्षस सम बनकर नरक में जाना चाहेगा?
• सामिष (माँस पदार्थ) में एक जीव नहीं, अधिसंख्य जीवों की हिंसा

माँस में केवल एक जीव का ही प्रश्न नहीं है। जब जीव की मांस के लिए हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मक्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का क्षण मात्र में मक्खिओं को कैसे आभास हो जाता है, उसी क्षण से वह मांस मक्खिओं के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही असंख्य सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार होता है, वे बुचडखाने व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, वे रोगाणु भी तो जीव ही होते है। यानि एक ताज़ा मांस के टुकडे पर ही लाखों मक्खी के अंडे,लार्वा। लाखों सुक्ष्म जीव और लाखों रोगाणु होते है। इतना ही नहीं पकने के बाद भी मांस पूर्ण सुरक्षित नहीं हो जाता, उसमें जीवोत्पती निरंतर जारी रहती है। इसलिये, एक जीव का मांस होते हुए भी, संख्या के आधार पर माँस असंख्य-अनंत जीवहिंसा का कारण बनता है।

यह भ्रांत धारणा है कि माँसाहार उद्देश्य से होने वाले वध में मात्र एक जीव के वध का पाप लगता है। जबकि सच्चाई यह है कि माँसाहार में, उस एक जीव सहित, माँस में उत्पन्न व उस पर आश्रित असंख्य जीवों के वध का दुष्कर्म दोष भी लगता है। निश्चित ही माँस में महाहिंसा है।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस उद्योग।

भुखमरी, कुपोषण के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण गिनाए जाते रहे हैं, लेकिन मांसाहार की चर्चा शायद ही कभी होती हो, जबकि वास्तविकता यह है कि दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण मांसाहार का बढ़ता प्रचलन है। इसकी जड़ें आधुनिक औद्योगिक क्रांति और पाश्चात्य जीवन शैली के प्रसार में निहित हैं। दुनिया में यूरोप की सर्वोच्चता स्थापित होने के साथ ही मांसाहारी संस्कृति को बढ़ावा मिलना शुरू हुआ। आर्थिक विकास और औद्योगीकरण ने पिछले दो सौ साल में मांस केंद्रित आहार संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विकास व रहन-सहन के पश्चिमी माडल के मोह में फंसे विकासशील देशों ने भी इस आहार संस्कृति को अपनाया। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे मांस व पशुपालन उद्योग फल-फूल रहा है।

गौरतलब है कि 1961 में विश्व का कुल मांस उत्पादन 7.1 करोड़ टन था, जो 2007 में बढ़कर 28.4 करोड़ टन हो गया। इस दौरान प्रति व्यक्ति खपत बढ़कर दोगुने से अधिक हो गई। विकासशील देशों में यह अधिक तेजी से बढ़ी और 20 वर्षो में ही प्रति व्यक्ति खपत दोगुनी से अधिक हो गई। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उदाहरण के लिए पहले चीन में पोर्क्स (सूअर का मांस) सिर्फ वहां का संभ्रांत वर्ग खाता था, लेकिन आज वहां का गरीब तबका भी अपने रोज के खाने में उसे शामिल करने लगा है। यही कारण है कि चीन द्वारा पोर्क्स के आयात में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

औद्योगिकीकरण व पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव के कारण उन देशों में भी मांस प्रमुख आहार बनता जा रहा है जहां पहले कभी-कभार ही मांस खाया जाता था, जैसे भारत। भारत में भी नॉन वेज खाना स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। जिन राज्यों व वर्गों में संपन्नता व बाहरी संपर्क बढ़ा है, उनमें मांस के उपभोग में भी तेजी आई है। इस कारण हमारे ट्रैडिशनल फूड की बड़ी उपेक्षा हुई है। इस क्रम में परंपरागत आहारों की घोर उपेक्षा हुई। पहले गांवों में कुपोषण दूर करने में दलहनों, तिलहनों, गुड़ की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, लेकिन खेती की आधुनिक पद्धतियों व खानपान में इन तीनों की उपेक्षा हुई। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए विटामिन की गोली दी जाने लगी।

पहले प्राकृतिक संसाधनों पर समाज का नियंत्रण होने से उसमें सभी की भागीदारी होती थी, लेकिन उन संसाधनों पर बड़ी कंपनियों, भूस्वामियों के नियंत्रण के कारण एक बड़ी जनसंख्या इनसे वंचित हुई। शीतल जल के प्याऊ की जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोतलबंद पानी ने ले ली और वह दूध से भी महंगा बिक रहा है। फार्म एनिमल रिफार्म मूवमेंट के अनुसार अमेरिकी उपभोक्ता मांस की भूख के कारण न केवल पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं, अपितु अमेरिकी आहार आदतें दुनिया भर में फैल रही हैं। विज्ञान व तकनीक का क्षेत्र हो या फैशन, यह धारणा दुनिया भर में फैल गई है कि जो अमेरिका कर रहा है वह ठीक है। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले गांव-जंगल-खेत आधारित पशुपालन होता था। इस पद्धति में खेती, मनुष्य के भोजन और पशुआहार में कोई टकराव नहीं था। दूसरी ओर आधुनिक पशुपालन में छोटी सी जगह में हजारों पशुओं को पाला जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा मांस हासिल किया जा सके। इस तंत्र में बड़े पैमाने पर मांस का उत्पादन होता है, जिससे वह सस्ता पड़ता है और अमीर-गरीब सभी के लिए सुलभ होता है।

इस आधुनिक पशुपालन ने प्रकृति व मनुष्य से भारी कीमत वसूल की। इस पशुपालन में पशु आहार तैयार करने के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पानी का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। सघन आवास, रसायनों और हार्मोन युक्त पशु आहार व दवाइयां देने से पर्यावरण और हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। पशुपालन के इन कृत्रिम तरीकों ने ही मैड काऊ, बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू जैसी नई महामारियां पैदा की हैं।

मक्का और सोयाबीन की खेती के तीव्र प्रसार में आधुनिक पशुपालन की मुख्य भूमिका रही है। आज दुनिया में पैदा होने वाला एक-तिहाई अनाज जानवरों को खिलाया जा रहा है, जबकि भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका में दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है।

मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। जैसे-जैसे मांस की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे पशु आहार की खेती बढ़ती जाएगी, और इससे ग्रीनहाउस गैसों में भी तेजी से बढ़ोतरी होगी।
(रमेश कुमार दुबे के लेख का अंश)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

माँसाहार से ग्लोबल वॉर्मिंग


क्या आप नॉन-वेज खाते हैं?

अगर हां, तो क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करके आप ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ा रहे हैं? यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। हमारी टेबल पर सजा लज़ीज़ मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है।

फूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के अनुसार पशुपालन क्षेत्र ग्लोबल ग्रीन हाउस गैसों में 18 प्रतिशत का योगदान करता है जो कि परिवहन क्षेत्र से अधिक है। पशुपालन के कारण ग्लोबल टेम्प्रेचर भी बढ़ा है। असल में दुनिया भर में चरागाह और पशु आहार की खेती के लिए वनों को काटा जा रहा है। एफएओ के अनुसार लैटिन अमेरिका में 70 प्रतिशत वन भूमि को चरागाह में बदल दिया गया है। पेड़- पौधे कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक होते हैं। पेड़ों के कम होने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है जिसके कारण तापमान में भी बढ़ोतरी होती है। ऐनिमल वेस्टेज से नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस निकलती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना जहरीली है। गौ पालन के कारण मिथेन का उत्पादन होता है, जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में तेइस गुना खतरनाक है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में बीफ का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

कोपनहेगन सम्मेलन में साफ हो गया कि कार्बन इमिशन में कटौती पर कानूनी बाध्यताओं को स्वीकार करना फिलहाल संभव नहीं है। यह भी तय हो गया कि इमिशन में स्वैच्छिक कटौती तब तक संभव नहीं होगी जब तक कि जन-जन इसके लिए प्रयास न करे। इस दिशा में मांसाहार में कटौती एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के अन्य उपायों की तुलना में यह सबसे आसान है। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
(रमेश कुमार दुबे के आलेख का अंश)