शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है।



अकसर कहा जाता है कि आहार व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि (चॉइस) की बात है। जिसका जो दिल करे खाए। हमारा आहार कोई अन्य उपदेशित या प्रबन्धित क्यों करे? क्या खाना क्या नहीं खाना यह हमारा अपना स्वतंत्र निर्णय है।

किन्तु यह सरासर एक संकुचित और स्वार्थी सोच है, विशेषकर तब जब उसके साथ हिंसा सलग्न हो। प्रथम दृष्टि में व्यक्तिगत सा लगने वाला यह आहार निर्णय, समग्र दृष्टि से पूरे विश्व के जन-जीवन को प्रभावित कर सकता है। मात्र आहार ही नहीं हमारा कोई भी कर्म यदि किसी दूसरे के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा हो, उस दशा में तो और भी धीर-गम्भीर चिंतन और विवेकयुक्त निर्णय हमारा उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि आपके किसी भी कृत्य से कोई दूसरा  (मनुष्य या प्राणी जो भी) प्रभावित होता है, समाज प्रभावित होता है, देश प्रभावित होता है विश्व प्रभावित होता है उस स्थिति में आपके आहार-निर्णय की एकांगी सोच या स्वछंद विचारधारा, कैसे मात्र व्यक्तिगत रह सकती है।

अन्य जीवन का सवाल :-

यह तो साफ है कि माँस किसी प्राणी का जीवन समाप्त करके ही प्राप्त किया जा सकता है। जो आहार किसी दूसरे प्राणी का जीवन ही हर ले, जिसमें किसी अन्य प्राणी को अपनी मूल्यवान जान देनी पडे, कैसे मात्र आपका व्यक्तिगत मसला हो सकता है।

भावनायें आहत होती हैं :-

माँसाहारियो के लिये यह मात्र आहार की बहस है। पर शाकाहारियों के लिये निश्चित ही किसी जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। पशुओं को कटते हुए न देख पाना, खून से लथपथ माँस, यत्र-तत्र बिखरे उनके व्यर्थ अवयव, पकने पर फैलती इन पदार्थों की दुर्गन्ध, खाते देखकर पैदा होती जगुप्सा। दूसरो की भावनाओं को आहत करने के लिए पर्याप्त है। जो आहार दूसरों की भावनाओं को आहत करे, कैसे यह  मुद्दा व्यक्तिगत पसंद तक सीमित हो सकता है?

हिंसा को प्रोत्साहन :-

जब आप माँसाहार करते है तो समाज में यह संदेश जाता है कि माँसाहार में छुपी पशुहिंसा सहज सामान्य है यह आहार शैली एक तरह से हिंसा को अप्रत्यक्ष समर्थन है। यह प्रकृति में उपस्थित जीवन का अनादर है। यह सोच समाज में शनैः शनैः निष्ठुरता का प्रसार करती है। यदि आहार इस तरह समाज के मानवीय जीवनमूल्यों को क्षतिग्रस्त करे तो वह कैसे मात्र व्यक्तिगत मामला हो सकता है।

वैश्विक मानव पोषण और स्वास्थ्य :-

पोषण के भी असंयमी स्वछंद उपभोग से न केवल प्राकृतिक-वितरण में असन्तुलन पैदा होता है बल्कि आप अतिरिक्त माल को व्यर्थ मिट्टी बना रहे होते है। अतिरिक्त उर्ज़ायोग्य तत्वों को अनावश्यक अपशिष्ट बना कर व्यर्थ कर देते है। यह दुरपयोग, किसी कुपोषण के शिकार के मुंह का निवाला छीन लेने की धृष्टता है। इस प्रकार व्यर्थ गई उर्ज़ा को पुनः रिसायकल करने में प्रकृति का  बेशकीमती समय तो बर्बाद होता ही है, प्रकृति के संसाधन भी अनावश्यक ही खर्च होते है।  तब बात और भी गम्भीर हो जाती है जब आप जो उर्ज़ा सीधे वनस्पति से प्राप्त कर सकते थे, बीच में एक जानवर और उसकी बेशकीमती जान का भोग ले लेते है। और मांसाहार से द्वितीय श्रेणी की उर्ज़ा पाने का निर्थक और जटिल उद्यम करते है। माँसाहार, कुपाच्य और रेशे रहित होता है परिणाम स्वरूप कईं रोगों का निमंत्रक बनता है, इसे अगर व्यक्तिगत आरोग्य-हानि भी मान लें पर सामुहिक रूप से यह विश्व स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायी है। माँसाहार पर सवार होकर प्रसार पाती महामारियों से आज कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। इस तरह मांसाहार जब वैश्विक पोषण और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है तो कैसे मात्र व्यक्तिगत चुनाव का प्रश्न कहकर पल्ला झाडा जा सकता है?

विश्व खाद्यसंकट-

भोजन का सम्मान होना चाहिए, उसका दुरपयोग या अपव्यय दूसरे प्राणी के मुँह के कौर को धूल में मिलाने के समान है। जब हम अपना भोजन बनाने की विधि में भी अनावश्यक व्यर्थ करते है या हमारी थाली में भी जूठा छोड कर फैक देते है तो यह भी एक अपराध है। यह दूसरे लोगों को भूखमरी के हवाले करने का अपराध है। जब भोजन के साथ सहज ही हो जानेवाला यह मामूली सा अविवेक भी अपराध की श्रेणी में आता है तो 13 किलो शाकाहार को व्यर्थ कर के आहार के लिए मात्र 1 किलो माँस पाने की क्रिया कैसे निर्दोष हो सकती है? और पशु की आधे से भी अधिक मात्रा वेस्टेज कर दी जाती है। विश्व की एक-चौथाई उपजाऊ भूमि पशुपालन में झोंक दी गई है। यह खाद्य अपव्यय, संसाधनो का दुरपयोग, प्रकृति के विनाश का अक्षम्य अपराध है। ऐसी मांसाहार भोजन-शैली, वैश्विक भूखमरी का कारण हो, जो हमारे समस्त जीवनोपयोगी संसाधनो की बरबादी का कारण हो, कैसे एक व्यक्तिगत मामले में खपा दी जा सकती है।

विश्व पर्यावरण :-

नवीनतम शोध के अनुसार लगभग सभी वैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि माँसाहार का प्रयोग ग्लोबल वॉर्मिंग का एक प्रमुख कारक है। मांस-उद्योग सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसेज का स्रोत बनकर मुँह चि्ढ़ा रहा है। पर्यावरण दूषण आज मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बनकर खड़ा है। क्योंकि अनियंत्रित भोग और मनमौज ही प्राकृतिक संसाधनों का शोषण है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी अर्थात् मानव अस्तित्व के लिए विकराल खतरा। जिस निर्णय से मानव अस्तित्व ही खतरे में पड जाय तो कैसे उस चुनाव को मात्र व्यक्तिगत कह कर किनारा किया जा सकता है?

नशा, ड्र्ग्स, धूम्रपान, गुटका आदि व्यक्तिगत खुराक होते हुए भी व्यक्तिगत इच्छाओं के अधीन स्वछंद छोडी नहीं जा सकती। यह समस्त विश्व के स्वास्थ्य कल्याण का गम्भीर प्रश्न बनती है। उसी तरह आहार भी यदि वैश्विक समस्याएँ खडी करता है तो मसला किसी भी दृष्टि से व्यक्तिगत चुनाव तक संकीर्ण नहीं रह जाता।

इस तरह 'आहार का चुनाव' केवल आहारी व्यक्ति के व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय नहीं है। आपका आहार समाज से लेकर वैश्विक पर्यावरण तक को प्रभावित करता है। वह सीधे सीधे वैश्विक संसाधनो को प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप से विश्व शान्ति को प्रभावित करता है।जीव-जगत के रहन-सहन-व्यवहार ही नहीं उनके जीने के अधिकार को प्रभावित करता है। फिर भला आहार, मात्र व्यक्तिगत मुद्दा कैसे हो सकता है!!॥

21 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा, जीवहत्या का मामला व्यक्तिगत पसन्द से कहीं आगे का मामला है। नैतिकता, भावनायें, पर्यावरण, ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे तो हैं ही, यह निरीह प्राणियों पर अत्याचार भी है। इस विषय में हम सब को ठंडे दिमाग से सोचकर, अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी समझकर, ईमानदार प्रयास करने की आवश्यकता है।

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  2. यक़ीनन जो निर्णय पूरे वैश्विक पर्यावरण को प्रभावित करता हो वो व्यक्तिगत पसंद के आधार पर नहीं लिया जा सकता ....अच्छी जानकारी देती सार्थक पोस्ट

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  3. १. जो आहार किसी दूसरे प्राणी का जीवन हर ले,
    २. जो आहार दूसरों की भावनाओं को आहत करे
    ३. पशुहिंसा , निष्ठुरता का प्रसार करे
    ४. वैश्विक स्वास्थ्य , प्राकृतिक-वितरण में असन्तुलन
    ५. भोजन का दुरपयोग या अपव्यय :
    . "13 किलो शाकाहार को व्यर्थ कर के आहार के लिए मात्र 1 किलो माँस पाने की क्रिया "
    ६. ग्लोबल वॉर्मिंग :

    ?????? कैसे उस चुनाव को मात्र व्यक्तिगत कह कर किनारा किया जा सकता है? ??????

    आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय सुज्ञ जी - बिलकुल सच और सही कह रहे हैं आप - यह व्यक्तिगत मुद्दा नहीं - बल्कि सारे मानव समुदाय का मुद्दा है |

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  4. आहार का सवाल जटिल सवाल है | भावनाएं परिवेश से विकसित होती हैं | मांसाहार पूर्णत : गलत नहीं हो सकता | सब चीजों में संतुलन रहना चाहिए | शाकाहारियों ने जैविक विविधता की जो नुकसान पहुँचाया है उसके दुष्परिणाम कम कष्टदायी नहीं है |

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    1. @आहार का सवाल जटिल सवाल है |

      -अमरनाथ साहब, आहार का सवाल बिलकुल जटिल नहीं है, जटिल है तो मानव मन के प्रलोभन और तृष्णा आधारित बहाने। जिन्हें मानव स्वयं कुटिलता से जटिल बनाकर पेश करता है।

      @भावनाएं परिवेश से विकसित होती हैं |

      - कोई भी परिवेश अनैतिक भावनाओं को विकसित करनेवाला लगभग तो नहीं होता। तथापि सभी परिवेश की भावना सभ्यतालक्षी होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सभी को सुख और शान्ति की ही अभिलाषा है। अन्ततः दया, करुणा, शान्ति की भावनाएं सभी को वांछित है।

      @मांसाहार पूर्णत : गलत नहीं हो सकता |

      - किसी भी वस्तु के गलत होने के लिए और कितने कारण चाहिए?

      @सब चीजों में संतुलन रहना चाहिए |

      - यदि मात्र शाकाहार से ही पूर्ण आहार संतुलन प्राप्त किया जा सकता है तो फिर किस संतुलन की बात हो रही है? पूर्ण संतुलित सामग्री में अनावश्यक वस्तु का संमिश्रण क्या मायने रखता है। संतुलन के लिए निरामिष पर प्रस्तुत "संतुलित पोषणस्रोत" अवश्य देखें।

      @शाकाहारियों ने जैविक विविधता की जो नुकसान पहुँचाया है उसके दुष्परिणाम कम कष्टदायी नहीं है |

      -अमरनाथ साहब,शाकाहारियों द्वारा जैविक विविधता को नुकसान पहुँचाने का कथन पूर्णतया मिथ्या है। ऐसा तो झूठा भ्रम तक कहीं विद्यमान नहीं है। दुष्परिणाम? ऐसा कौनसा दुष्परिणाम है जो कष्ट्दायी हो?
      मनुष्य अपने आहार में जिन अन्न, दालें, तरकारी और फल का उपयोग आदिकाल से करता आया है, उसमें से वनस्पति की एक भी प्रजाति लुप्त नहीं है।
      शाकाहारी पशु जो कि निश्चित ही मांसाहारी प्राणीयों की तुलना में अनेक-गुना है, जिस वनस्पति को वे अपना आहार बनाते आ रहे है उनके विशाल आहार से भी किसी तुच्छ सी वनस्पतिक प्रजाति का पूर्णतया नाश नहीं हुआ है।
      मानव नें अन्न आदि का उत्पादन बढ़ाया है और जो प्राणी मात्र घास पर निर्भर थे उन्हें भी अधिक मांस पाने की लालच में अनाज खिला रहा है। प्रकृति के प्रति संयम भाव के कारण ही शाकाहारी रहने वालों पर जैविक विविधता को नुकसान पहुँचानें का आरोप दुर्भाग्यपूर्ण है।
      अधिक जानकारी के लिए निरामिष पर "तर्कसंगत-विकल्प" अध्याय अवश्य देखें

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    2. @ आहार का सवाल जटिल सवाल है - कैसे ?? जटिलता कैसी ? पेट तो हर प्राणी भर ही लेता है, और हमें (मनुष्यों को) तो फिर इतनी जानकारी उपलब्ध है, इतने तरह के शाक सब्जियां अन्न आदि हैं - जटिलता कहाँ है ?

      @ भावनाएं परिवेश से विकसित होती हैं | नहीं - भावनाएं मन से आती हैं - परिवेश से वे सिर्फ polish होती हैं, परन्तु मूल रूप से भावनाएं अंतर्मन से उपजती हैं |

      @ मांसाहार पूर्णत : गलत नहीं हो सकता | - यदि हत्या गलत है - तो मांसाहार भी गलत है | जीवित रहने का जितना अधिकार हमें है, उतना ही उन मूक पशुओं को भी जिन्हें हम हत्या कर के खा लेना चाह रहे हों / खा रहे हों |

      @ सब चीजों में संतुलन रहना चाहिए | - किन चीज़ों में ? foodcycle में ? उस के हिसाब से तो हम मनुष्य भी मांसाहारी पशुओं के भोजन योग्य हैं - तो क्या हम और आप अपने आप को उनके समक्ष परोस देते हैं?

      @ शाकाहारियों ने जैविक विविधता की जो नुकसान पहुँचाया है उसके दुष्परिणाम कम कष्टदायी नहीं है | यह तो एकदम ही मिथ्या बात है | न कहीं किसी नुकसान की, न ही किसी दुष्परिणाम की बातें पढ़ी हैं | और फिर - क्या मांसाहारी शाकाहार नहीं लेते ? सिर्फ मांसाहार पर जीते हैं ? न - वे सिर्फ शाक सब्जियों की जगह मांस प्रयुक्त करते हैं, और अन्न आदि उतनी ही मात्र में उपयोग करते हैं, जितना शाकाहारी |

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. चर्चा-मंच पर इस आलेख को सम्मलित करने के लिए आभार शास्त्री जी!!

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  6. आज ही मैंने अपने एक धूम्रपान करने वाले साथी से कहा कि जिन प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का अधिकार हो उन्हें अपनी एक बुरी लत के कारण बरबाद [प्रदूषित] नहीं करना चाहिए... वे इस बात को समझ भी गये... जल, वायु, मृदा और आकाश (स्पेस) पर सभी जीवधारियों का अधिकार है. उनके शुद्धिकरण के प्रयास करने चाहिए न कि उन्हें हानि पहुँचाने के.
    ........ इस अति उपयोगी लेख के लिये साधुवाद.
    सुज्ञ जी और शिल्पा जी के प्रतिउत्तर पढ़कर मन गदगद हुआ....

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  7. सुज्ञ जी बड़ी पुरानी कहावत है कि पररूचि श्रृंगार और स्वरुचि भोजन... लेकिन आपकी इस व्याख्या ने इस बात को एक नया अर्थ प्रदान किया है.. हमारे सभी व्यवहार अभ्यास का परिणाम हैं.. और मांसाहार उसी अभ्यास का परिणाम है.. मेरे परिवार में पाँच भाई-बहनों में से अकेला मैं (और अब मेरा छोटा भाई भी) शाकाहारी रहा प्रारम्भ से.. मैं अपने पितामह का प्रिय था और उनके अभ्यास ने मुझे शाकाहारी बना दिया (मुझे इसका गर्व है-क्षोभ नहीं).. जब सम्पूर्ण मांसाहारी परिवार में अभ्यास से मैं शाकाहारी हो सकता हूँ तो स्वरुचि को स्वाभाविक तौर पर शाकाहार की ओर प्रवृत क्यों नहीं किया जा सकता!
    बहुत ही सुरुचिपूर्ण व्याख्या!! और हाँ टिप्पणियों से भी नई दिशा मिलाती है!!

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    1. सलिल जी आपके अनुभव नें मेरी व्याख्या को पुख्ता आधार प्रदान कर दिया है। बहुत ही सुन्दर बात कही आपने हमारा भोजन तो स्वरूचि ही होता है पर अपनी रूचि को विवेकपूर्वक सुरूचि में प्रवृत करने का पुरुषार्थ करना होता है।

      इस टिप्पणी के लिए अनंत आभार!!

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  8. हर छोटे निर्णय का असर वैश्विक है..

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  9. समाज लोगों से ही मिलकर बना है और यह बात बिलकुल ठीक है कि परिवेश काफी हद तक मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करता है. किन्तु आंतरिक भावनाओं को बिलकुल ही नहीं दबाया जा सकता, उन्हें वातावरण के हिसाब से ढाला जा सकता है.
    इसका दूसरा पहलू भी है कि परिवेश भी हम लोग ही बनाते हैं, घूरे के ढेर भी हम लगाते है और एक स्वच्छ सुन्दर पार्क का निर्माण भी हम ही करते हैं. प्रश्न मानसिकता का है और प्रवृति का है. एक बहुत सुन्दर आलेख. धन्यवाद सुज्ञ जी..

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  10. ---निश्चय ही आहार पर अत्यन्त तर्कपूर्ण व वैग्यानिक ढंग से वर्णन किया गया है जो सुरुचिपूर्ण, स्पष्ट व सटीक है...सुग्य जी बधाई के पात्र हैं...

    ---अमरनाथ जी की शाकाहारियों द्वारा जैव विविधता को हानि ..के प्रश्न को सुग्य जी ने पूर्ण रूप से उत्तरित कर दिया है ......
    ------वैसे भी शाकाहारी तो शाक, फ़ल, सब्जी आदि सभी कुछ स्वयं उगा कर आहार में प्रयोग करते हैं न कि प्राक्रितिक पैड-पौधे वनों से लेकर य उन्हें नष्ट करके .... जहां तक जन्गलों को खेती के लिये काटने-साफ़ करने की बात है...वह तो मनुष्य कालोनी बनाने के लिये बसने के लिये करता है जो समयानुकूल एक आवश्यक सहज़ प्राक्रतिक विकास की घटना है...फ़िर वही मानव उसी भूमि में खादय उगा कर प्रक्रितिक वातावरण की पूर्ति भी करता है....

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    1. और फिर - यहाँ बात शाकाहार और मांसाहार के सन्दर्भ में है - यदि खेती के लिए जंगल काटने की बात हो, तो मांसाहार के लिए जिन बेचारे जीवों को पाला जाता है - उनके चरागाहों के लिए इससे कहीं अधिक जमीन चाहिए - तो इस पहलू से भी शाकाहार ही बेहतर है - वनों को कम काटना पड़ेगा | इसी "निरामिष" ब्लॉग पर एक और पोस्ट है - हिंसा का अल्पीकरण .... उसी तर्ज पर , पर्यावरण के लिहाज़ से सोचा जाए तो - जिस तरीके (शाकाहार) में कम जंगल काटने पड़ें वह अधिक काटने से बेहतर है (मांसाहार)

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  11. अपना पेट भरने के अन्य उपाय मौजूद थे ऐसे में जीव हत्या का पाप अपने सिर कभी नहीं ले सकता था, इसी विचार के चलते मांसाहार से सदैव से दूर हूं। अन्य को भी प्रेरित करता हूं किसी की जान लेकर अपना पेट भरना ठीक नहीं।

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  12. सलिल जी के अनुभव मन में अपार हर्ष लाते हैं.... वहीँ डॉ. श्याम गुप्त जी और भारतीय नागरिक जी की सारगर्भित टिप्पणियों ने इस आलेख की शोभा बढ़ाई. ...
    मुझे इस निरामिष परिवार में आने वाले विद्वानों के विचार जानकर अपने तर्कों को कुछ और खाद-पानी मिल जाता है.

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  13. कुछ भी कहिये एक शाकाहारी को मांसाहारी में कोई भी अच्छे दिखाई नहीं देगी ..
    kalamdaan.blogspot.in

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  14. जितना बेहतर लेख .....उतनी बेहतर टिप्पणियाँ

    निरामिष पर आ कर चित्त आनंदित हो जाता है

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