शुक्रवार, 16 मार्च 2012

शाकाहार अपनाइये प्रसन्न रहिये।

शाकाहार अपनाइये प्रसन्न रहिये।

शाकाहार स्वास्थ्यप्रद है, इस तथ्य में किसी को भी शंका नहीं है। आज के समय में हर किसी को पता है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी अच्छे स्वास्थ्य के कारण शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। भारतीय विचारधारा और हमारे व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर यह समझा जाता है कि मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर भी शाकाहार का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अभी तक इस विषय पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन न होने के कारण वैज्ञानिक दायरों में विशेषकर मांसाहार-मत्स्याहार को प्रोत्साहन देने वाले विभागों में शायद यह बात खुलकर नहीं कही जा रही हो, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। पश्चिम में शाकाहार का प्रचलन बढने के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य प्रभावों के वैज्ञानिक अध्ययन बढ रहे हैं और निरामिष भोजन शैली के पक्ष में नई-नई अकाट्य जानकारियाँ सामने आ रही हैं।

पिछले दिनों देखा गया था कि अज्ञानवश अफ़वाहें फैलाने वाले कुछ लोग तो शाकाहार को अल्ज़ाइमर और बौद्धिक बौनेपन से भी जोड़ने का अधकचरा प्रयत्न कर रहे थे। ऐसी अफ़वाहों के पीछे कुछ सामान्य भ्रम थे, जैसे मत्स्य या मांस को आवश्यक पोषक तत्वों का अकेला आपूर्तिकारक मानना।

ऐसे ही भ्रमों के बारे में सत्य जानने के लिये एक अध्ययन अमेरिका के ऐरिज़ोना राजकीय विश्वविद्यालय के पोषण विभाग में डॉ बॉनी बीज़होल्ड (Bonnie L Beezhold) के नेतृत्व में हुआ था जिसकी रिपोर्ट जून 2010 से अंतर्जाल पर उपलब्ध है। इस अध्ययन में संयुक्त राज्य के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र के सेवेंठ डे ऐड्वेंटिस्ट समुदाय से स्वस्थ भागीदारों को लेकर उन्हें पहले शाकाहारी या मांसाहारी भोजन उपलब्ध कराया गया और फिर उनसे 152 प्रश्नों की निम्न तीन प्रश्नावलियों के आधार पर जाँच की गयी:

  • भोजन की आवृत्ति
  • अवसाद, बेचैनी, तनाव की मात्रा (DASS=Depression Anxiety Stress Scale)
  • बदनुमाई की माप (POMS=Profile of Mood States) 


इस अध्ययन से एक बार फिर यह बात स्पष्ट हुई कि शाकाहार करने से जीवन में प्रसन्नता पढती है, तनाव और अवसाद कम होता है और यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिये मांसाहार से कहीं अधिक हितकर है। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आयी कि मछली खाने वालों के मुकाबले कुछ कम ओमेगा-3 की मात्रा होने पर भी शाकाहारियों पर इसका कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता है।

इस अध्ययन के लिये तैयार हुये स्त्री व पुरुषों में 64 शाकाहारी और 79 मांसाहारी थे जिनमें से गर्भवती लोगों को अध्ययन से हटाने के बाद 138 लोग बचे। मांसाहारियों में अवसाद, बेचैनी व तनाव की मात्रा शाकाहारियों से दोगुनी थी। बदनुमाई की मात्रा में भी मांसाहारी शाकाहारियों से कहीं आगे थे। शाकाहारी भोजन में वसा की मात्रा भी मांसाहारियों से कम पाई गयी।  इस अध्ययन ने इस जानकारी को फिर से पुष्ट किया है कि शाकाहार अपनाने में ही बुद्धिमानी है और शरीर और मस्तिष्क का हित भी है।

अधिक जानकारी के लिये इस अध्ययन की झलक देने के लिये परिणामों की एक तालिका यहाँ प्रस्तुत है। और अधिक जानकारी के इच्छुक न्युट्रिशन जर्नल पर पूरी रिपोर्ट पढ सकते हैं।

* शाकाहारी बनें, प्रसन्न रहें, स्वस्थ रहें!*

परिणाम तालिका - बायोमेड सेंट्रल से साभार (© 2010 Beezhold et al; licensee BioMed Central Ltd.)

DASS and POMS scores by diet group

OMNVEGP

Mean± SEMean± SEvalue

n = 78n = 60*



DASS-total117.511.888.320.880.000
     DASS-D4.810.691.670.280.000
     DASS-A4.310.531.530.240.000
     DASS-S8.400.925.120.520.024






POMS-total215.333.100.101.990.007
     Tension-anxiety6.043.833.830.400.031
     Depression-dejection8.990.804.364.100.000
     Anger-hostility7.086.724.280.550.010
     Fatigue7.590.665.030.470.021
     Confusion4.650.433.240.380.085
     Vigor19.150.7120.610.710.133

* < 0.05 is significant.
1 DASS normative scores: D-5.55, A-3.56, S-9.27, total 18.38.
2 POMS normative scores, M-F: T 7.1-8.2, D 7.5-8.5, A 7.1-8.0, V 19.8-18.9, F 7.3-8.7, C 5.6-5.8, total 14.8-20.3.
Beezhold et al. Nutrition Journal 2010 9:26   doi:10.1186/1475-2891-9-26


 कीवर्ड: Bonnie L Beezhold, Carol S. Johnston, Deanna R. Daigle, Arizona State University

34 टिप्‍पणियां:

  1. आभार - प्रसन्नता तो वैसे भी सब खोज रहे हैं :) लिंक के लिए भी आभार |

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  2. तनाव बेचैनी और अवसाद - झुंझलाहट, चिडचिडेपन, और क्रोध को जन्म देता है। मानसिकता अन्ततः मनोवृति में रूपान्तरित होती है।
    एक नवीनत्तम वैज्ञानिक शोध!! इस बहुमूल्य आलेख को यहां प्रस्तुत करने के लिए अनंत आभार!!

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    1. जी, भोजन की गुणवत्ता और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य की गुणवत्ता एक दूसरे को अवश्य प्रभावित करते हैं। एक पक्ष खराब तो दूसरा अपने आप ही बिगड़ता जाता है।

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  3. शाकाहार का सशक्त मानसिक कारण।

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    1. जी नैतिकता और मानसिक शांति के साथ जब स्वास्थ्य भी मिल रहा हो तो शाकाहार तो अपने आप ही बुद्धिमानों की पहली चॉइस बनेगा।

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  4. बहुत ही कीमती शोध है यह.. आभार, यहाँ शेयर करने के लिए!!

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  5. एक बार पुनः भारतीय शाकाहारी परम्पराओं की पुष्टि हुई. जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन. इसीलिए हमारे मनीषियों ने शाकाहार को सर्वोत्तम आहार माना है|

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    1. सत्य वचन! एक बार फिर हमारा पारम्परिक ज्ञान सही साबित हो रहा है।

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. शास्त्री जी, शाकाहार के बारे में इस तथ्यात्मक पोस्ट की चर्चा के लिये आभार।

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  7. अपुन तो पहले से ही शाकाहारी है। और लगे हाथ अपने जान पहचान वालों को भी यही सलाह देता रहता हूँ।

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    1. सही रास्ते पर हैं आप! चरैवेति, चरैवेति!

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  8. सात्विक शान्त चित के लिए शाकाहार ही आश्रयदाता है

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    1. असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः।
      ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥ (ईशोपनिषद् - 3)

      जीवन का हनन करने वाले और प्रकाशहीन व्यक्ति प्रेत समान होकर तमस से व्याप्त लोक में विचरते हैं।

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  9. प्रमादियों और दम्भियों की कुंठा मात्र है मांसाहार / जीवन को रचनाशील व सतत उर्जावान बनाए रखने का पत्थ्य तो शाकाहार ही है ......बहुत सुन्दर आलेख ,धन्यवाद शाकाहार के प्रचार व समर्थन के लिए /

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    1. सहमत हूँ! सत्य कब तक छिपेगा? शाकाहार के सूर्य ने भी संसार को प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया है।

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  10. अनवर ज़माल साहब आप रेड मीट से सेक्स की फ्रिक्युवेंसी पर पहुच गए यह विषय अंतरण है .रेड मीट की ओर लौटतें हैं .

    आपने शरीर से हटके आत्मा की बात की है ,बहुत अच्छा किया है .यह सारा मंडल एक ही है .सृष्टि में एक ही तत्व व्याप्त है वह है ऊर्जा .आत्मा कह लो इसे या सचेतन ऊर्जा.अल्लाह कह लो या ब्रहम तत्व .सभी आत्माएं एक हैं .जड़ चेतन में सभी में वही ऊर्जा (आत्मा )का वास है .एक तत्व की ही pradhaantaa kaho इसे जड़ या चेतन पशु पक्षी भी इसका अपवाद नहीं है वह सिर्फ 'रेड' और 'वाईट ',लीन ,मीट से आगे एक आत्मा भी हैं .शिकारी जब शिकार का पीछा करता है तो शिकार जान बचाके भागता है या फिर सामर्थ्य होने पर मुकाबला भी करता है .इस फ्लाईट और फाईट सिंड्रोम में एड्रीनेलिन का स्राव होता है .सारा सारे शरीर में इसका सैलाब होने लगता है .शिकार मारा जाता है .भय से पैदा हुई है यह रिनात्मक ऊर्जा जो सारे शरीर को संदूषित कर देती है .खून के थक्के बनतें हैं .अश्थी मज़ा संदूषित हो जाती है .मनुष्य इसी गोष्ट को खाता है .उसी अल्लाह या ब्रह्म को निवाला बनाता है .

    जिसे आप हलाल करतें है फिर खाते हैं रिनात्मक ऊर्जा से वह भी नहीं बचता है .उसका गोष्ट भी संदूषित होता है एड्रीनेलिन से बहले खून का थक्का न भी बने .

    बकर ईद पर वह कसाई भी बकरे के कान में यही कहता है -यह हरामी मुझसे जिबह करवा रहा है मैं तो अपना कर्म कर रहा हूँ अल्लाह मुझे ,यह जीव आत्मा मुझे मुआफ करे .सवाल इस्लाम या सनातन धर्म का नहीं है .चेतन तत्व का है अल्लाह का है ,उस तत्व का है जो मुझमे तुझमे,जड़ में चेतन में , सबमे व्याप्त है .

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    1. DR. ANWER JAMAL ने कहा…

      अंग्रेज़ों ने पता लगाया कि रेड मीट नुक्सान दे रहा है और वीरू भाई को फ़ौरन यक़ीन आ गया कि जब अंग्रेज़ों ने तय कर लिया है तो ज़रूर नुक्सान देता होगा।

      हमें अंग्रेज़ों की चालबाज़ियां पता हैं।

      इनकी रिसर्च पर भी रिसर्च करने की ज़रूरत होती है क्योंकि दुनिया के सामने रिसर्च के नाम पर वही परोसते हैं जिससे दुनिया के व्यापार पर इनका क़ब्ज़ा हो जाए।

      हमने फ़ौरन अपने पुराने ग्रंथ चरक संहिता में टटोला तो वहां रेड मीट खाने के लाभ ही लाभ बताए गए हैं।

      अंग्रेज़ कह रहे हैं कि रेड मीट खाने से आंत का कैंसर हो जाता है और हमारे महान भारतीय बुज़ुर्ग कह रहे हैं कि इससे यक्ष्मा का रोगी तक ठीक हो जाता है।

      किस की बात सही मानी जाए ?

      1. स्वदेशी विचार मंच पर बैठकर सोचा तो भी भारतीय बुज़ुर्गों की बात मानना हमारा फ़र्ज़ बनता है।

      2. फिर निष्पक्ष होकर सोचा कि अंग्रेज़ तो अपने किसी प्लान को लाने से पहले तरह तरह के शोशे छोड़ते हैं, उनकी बात अर्थलाभ से प्रेरित हो सकती है लेकिन हमारे चरक जी तो महर्षि हैं और उन्हें किसी से किसी लाभ का लालच था ही नहीं। इस लिहाज़ से भी उनका पलड़ा भारी बैठता है।

      3. इसके बाद ‘मैं कहता आंखन देखी‘ के आधार पर जांच की गई तो पाया कि रेड मीट रोज़ खाने के बावजूद हमारे कुनबे में तो क्या क़बीले में भी किसी को आंत का कैंसर न हुआ।

      अब सवाल यह खड़ा हुआ कि ‘या इलाही ! माजरा क्या है ?‘

      ...तो माजरा भी समझ में आ गया कि पश्चिमी विज्ञानियों के नतीजे केवल शरीर को सामने रखकर निकाले गए हैं जबकि आदमी केवल शरीर ही नहीं है, उसमें मन बुद्धि और आत्मा भी है और हरेक का जीवट अलग अलग भी होता है। इसी जीवट के बल पर भारतीय उन परिस्थितियों में भी जी लेते हैं जिनकी कल्पना मात्र से ही पश्चिमी लोगों के पसीने छूट जाएं। जिसका जीवट शक्तिशाली होता है उसकी जीवनी शक्ति भी अधिक होती है। अंग्रेज़ी में इसे इम्यून सिस्टम कहा जाता है।

      अगर आपने अपने जीवन साथी को तन मन और आत्मा तीनों स्तर पर संतुष्ट कर दिया तो उसके रोम रोम से, उसके दिल से आपके लिए दुआएं निकलेंगी और तब बीमारियां आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं। तन के स्वस्थ रहने में मन का रोल बहुत अहम है। हमारे भारतीय बुज़ुर्ग ऐसा कहते हैं और हम यही मानते हैं और आधुनिक परीक्षणों से भी इसकी सत्यता प्रमाणित हो चुकी है।

      अंग्रेज़ों की रिसर्च पर यक़ीन करने वालों के लिए उनकी ही एक रिसर्च पेश ए खि़दमत है, देखिए
      Regular Sex Improves Health and Doubles Life Expectancy

      (NaturalNews) You probably already know that Broccoli, carrots, and oranges are good for you. Yet it's rarely mentioned that having regular sex is not only fantastically fun, but brilliant for your health! A study at Queens University in Belfast published in the British Medical Journal tracked the sexuality of about 1,000 middle-aged men over the course of a decade. The study compared men of a similar age and health and showed that men who reported the highest frequency of orgasm lived twice as long as though who did not enjoy sex.

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    2. @आप रेड मीट से सेक्स की फ्रिक्युवेंसी पर पहुच गए
      वीरूभाई,
      दो कारण हो सकते है………

      १-मांस मदिरा मैथुन का वामाचारी सम्बंध जो है अतः

      २-आपने कभी देखा हो तो 'गुप्त रोगों के शर्तिया इलाज' वाले झोला-छाप हर मर्ज़ का इलाज योन सम्बंधो में ही देखते है। अगर इसी से लोगों का इम्यून सिस्टम फ़ौलादी बन जाए तो लोग नाहक़ ही पोषण, दवाओं और डॉक्टर के पिछे भागते है। :)

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  11. ब्लॉगर DR. ANWER JAMAL ने कहा…

    @ राम राम भाई ! आपने रेड मीट के बारे में आधुनिक रिसर्च पेश ही है और हमने उसके विषय में प्राचीन भारतीय चिकित्सकों का नज़रिया रखा है। हमने आपकी बात का खंडन कब किया है ?
    हम तो आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि
    "संशोधित रेड मीट के स्थान पर बतख ,मुर्गी ,मच्छी आदि खाने से ऐसे खतरे को कम किया जा सकता है"

    रिसर्च करने वालों ने यह भी पाया है कि जो लोग बचपन में भी प्यार से वंचित रहे और बड़े होकर भी अपने जीवन साथी से भावनात्क रूप से असंतुष्ट रहे, ऐसे लोग भी कैंसर की चपेट में आ जाते हैं।
    रिसर्च करने पर यह भी पाया गया कि सेक्स करने से इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है।
    असल बात यह है कि सही समय पर विवाह हो जाए और वे आपस में प्यार भरा संतुष्ट जीवन जिएं। इससे उनका इम्यून सिस्टम फ़ौलादी बन जाएगा। यही कारण है कि हमारे रिश्तेदारों में रेड मीट रोज़ खाया जाता है और अल्लाह का शुक्र है कि आज तक उनमें से किसी एक को भी कैंसर न हुआ।
    जिन देशों में ये रिसर्च हो रही हैं, वहां फ़ैमिली नाम की चीज़ ही बहुत कम रह गई है। भावनात्मक रूप से टूटे हुए लोगों पर किए गए परीक्षण उन पर लागू नहीं होते जो कि भावनात्मक रूप से संतुष्ट जीवन जी रहे हैं।

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    1. DR. ANWER JAMAL साहब तो खाने पिने के मामले में अक्सर ऊंट ,गधे, घोड़े , बकरी खाने की सलाह देते हैं .
      खैर वो उन की अपनी सोच है . लेख अच्छा है काफी जानकारी मिली,धन्यवाद .

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  12. जैसा अन्न वैसा मन ,जैसा पानी वैसी वाणी .

    शाकाहार से ही जुडी है स्वास्थ्य की नव्ज़ खुद चोटी के हृद विज्ञानी का आज दुनिया बहर में शाकाहार के समर्थन में अभियान चला रहें हैं इनमे डॉ बिमल छाजेड प्रमुख हैं .
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    1. @शाकाहार से ही जुडी है स्वास्थ्य की नव्ज़
      जी वीरुभाई, आपने सही कहा। भारतीय मनीषी तो पहले से ही कहते रहे हैं, "सत्यमेव जयते, नानृतम्"

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  13. DR. ANWER JAMAL साहब तो खाने पिने के मामले में अक्सर ऊंट ,गधे, घोड़े , बकरी खाने की सलाह देते हैं .
    खैर वो उन की अपनी सोच है . लेख अच्छा है काफी जानकारी मिली,धन्यवाद .

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  14. ज्ञान वर्धक लेख और चर्चा भी

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  15. Te deseo un intenso y placido fin de semana acunado por la armonía del descanso.

    Me he paseado por el jardín del olvido y he reunido las flores más bellas que se han abierto a la luz de la esperanza para ti...

    Un abrazo de azucenas
    Un beso de azaleas
    Esporas de amistad
    Aromas de sentimientos

    Cuidalas con esmero

    María del Carmen



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  16. मेरे आदरणीय स्मार्ट इंडियन भाई जान !फ़ूड पिरामिड में आधार से शीर्ष की ओर जाने में उपलब्ध ऊर्जा किस तरह और तेज़ी से घटती है इसे आपने एक किलोग्राम मांस की प्राप्ति में चुकता होते अनाज की मार्फ़त आसानी से समझा दिया .खेती के लिए वनों का सफाया कम हो जाए यदि मांसाहार चुक जाए .पार्यावरण पारि -तंत्र खुद अपना संतुलन कायम करतें हैं जैसे एक मछली घर में आबादी एक आदर्श आबादी से ज्यादा होने पर पारितंत्र खुद इसका प्रबंध करता है बड़ी मछली छोटी को खा जाती है . वैसे ही खाद्यान तो अकेला समुन्दर ही जुटा देगा .असल सवाल खाद्य -अखाद्य का है .प्रोटीन जुटाने का है उसके लिए जीव ह्त्या ज़रूरी नहीं है .

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  17. हमने "अन्ने वै प्राणः" ही हर जगह देखा है. कहीं भी "मांसे वै प्राणः" लिखा नहीं देखा|

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