शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

शाकाहार लेख संग्रह (कडियाँ)

शाकाहार अपनाने के कारण........
तर्कसंगत-विकल्प (सर्वांग न्यायसंगत) 
  1. प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था। 
  2. मनुष्य की सहज वृति और उसकी कायिक प्रकृति दोनो ही शाकाहारी है।
  3. मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल। 
  4. शाक से अभावग्रस्त, दुर्गम क्षेत्रवासी मानवो का अनुकरण मूर्खता!!
  5. सभ्यता व विकास मार्ग का अनुगमन या भीड़ का अंधानुकरण? 
  6. यदि अखिल विश्व भी शाकाहारी हो जाय, सुलभ होगा अनाज!!
  7. भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस-उद्योग!!
  8. शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!! 
  9. प्राणी से पादप : हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है। 
  10. प्रोटीन प्रलोभन का भ्रमित दुष्प्रचार।
  11. प्रोटीन मात्रा, प्रोटीन यथार्थ
  12. विटामिन्स का दुष्प्रचार।
  13. विटामिन बी12, विटामिन डी, विटामिन 'सी'।
  14. उर्ज़ा व शक्ति का दुष्प्रचार। 

शनिवार, 14 जून 2014

⊡ शाकाहारी उत्पाद - चिन्ह और प्रतीक

शाकाहार की प्राचीन गौरवमयी परंपरा के चलते, आज भी संसार भर में शाकाहारियों का प्रतिशत भारत में ही सर्वाधिक है। शाकाहार की सुदृढ़ और विस्तृत परंपरा के कारण अधिकांश भारत में सात्विक निरामिष भोजन सर्वसुलभ होना स्वाभाविक है। भोजन के प्रति संवेदनशीलता के चलते रसोई और भोजनालयों के भेद भी स्पष्ट हैं। फिर भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अक्सर स्वार्थ के लिए, कभी अज्ञानवश और कई बार मज़े के लिए भी अपने सहजीवियों का "धर्म-भ्रष्ट" करने की जुगाड़ में लगे रहते हैं। अमेरिका में अपने को भारतीय कहने वाले कई भोजनालय नान-रोटी में अंडे का प्रयोग करने लगे हैं और इस बाबत कोई नोटिस भी नहीं लगाते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के हिन्द-चीनी देशों के सामान्य भोजन और चटनियों में जल-जीवों के अवशेष पाया जाना सामान्य सी बात है।

प्रचारित धारणाओं के विपरीत भोजन में छूआछूत शाकाहारियों की विशेषता नहीं है। भारत के अधिकांश मांसाहारी झटका, हलाल या कुत्ता जैसे नियमों के पाबंद हैं। कोई गोमांस से बचता है तो कोई सूअर के मांस से। पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों में चाव से खाया जाने वाला कुत्ते का मांस पश्चिम भारत के किसी भी मांसाहारी के मन में वितृष्णा उत्पन्न कर सकता है। भारत के बाहर भी संसार के लगभग सभी मांसाहारी समुदायों में कट्टर भोजन-भेद मौजूद रहा है। यहूदी संप्रदाय कोशर खाता है तो मुसलमान हलाल तक सीमित हैं। मध्य-पूर्व के दयालु समझे जाने वाले लोकनायक हातिमताई द्वारा भोजन के लिए अपना पालतू घोड़ा मारकर पका देने की कथा है जबकि अमेरिका में घोड़ा खाने वाले को असभ्य और क्रूर माना जाएगा। निष्कर्ष यह कि संसार में अविचारी सर्वभक्षी लोगों की संख्या कम है। अधिकांश लोग कुछ भी खाने से पहले उसके बारे में आश्वस्ति चाहते हैं। एलर्जीग्रस्त कितनों के लिए यह स्वास्थ्यगत अनिवार्यता भी है।

प्राचीन भारतीय समाज में हर काम करने की पद्धति निर्धारित थी। संस्कृत भाषा, अंक पद्धति और लिपियों का विकास भी विदेशों से अलग नियमबद्ध रूप से ही हुआ है। आज भले ही हम संकल्प और पद्धति को पिछड़ापन बताकर "जुगाड़" और "चलता है" को सामान्य मानने लगे हों लेकिन विकसित देशों में सब काम नियम से किया जाता है। वहाँ भोज्य पदार्थों में उनके तत्व सूचीबद्ध करने की भी कानूनी बाध्यता लंबे समय से रही है। सामान्य प्रचलित तत्वों के अतिरिक्त अप्रचलित रसायनों के लंबे और जटिल वैज्ञानिक नाम के चलते उन्हें सूचीबद्ध करने  के लिए ई संख्या कूट (E number code) का प्रयोग किया जाता है। इन कूट संख्याओं के बारे में इन्टरनेट पर काफी भ्रम फैले हुए हैं। किसी आगामी आलेख में उन पर विस्तार से चर्चा की जाएगी।

सन 2006 में स्थापित भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण स्वस्थ और विश्वसनीय भोजन चुनने की दिशा में अच्छी पहल है। भोजन के व्यावसायिक उत्पादन, भण्डारण, वितरण आदि के नियम बनाना और उनका अनुपालन कराना भी प्राधिकरण के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है। परंपरागत भारतीय शाकाहार (दुग्धाहार सम्मिलित) और मांसाहार की पेकेजिंग/थैली/पुलिंदे पर संस्थान द्वारा स्पष्ट हरे या लाल चिन्ह द्वारा पहचान आसान किए जाना एक सराहनीय कदम है।  

डब्बाबंद/प्रीपैकेज्ड भोज्य पदार्थ खरीदते समय हरा शाकाहारी चिन्ह देखिये और सात्विक भोजन को बढ़ावा दीजिये। बल्कि मैं तो यही कहूँगा कि पर्यावरण संरक्षण में सहयोग देते हुए, थैली/डिब्बा के भोजन पर निर्भरता ही यथासंभव कम कीजिये। निरामिष परिवार की ओर से आपके सात्विक स्वस्थ जीवन की शुभकामनायें।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

मांसाहार और शाकाहार समान हैं ?

मांसाहार और शाकाहार समान हैं ?

अक्सर सुनती हूँ मैं 
तर्क मांसाहार के सन्दर्भ में 
कि 
शाकाहार और मांसाहार समान हैं। 

क्या सच ?

एक सुखद अनुभूति की
याद है मन में
कॉलेज की खिड़की पर बैठी मैं 
खिड़की से भीतर आती 
सौम्य जीवनदायी वायु।  

गहरी साँसें लेती मैं 
अमृत को भीतर प्रविष्ट होते 
महसूस कर पाती हूँ। 
पौधों की हंसती टहनियाँ 
पेड़ों की झूमती डालियाँ 
दूर तक दिखते ,
नारियल के गर्वित वृक्ष 
जिनसे अनेकानेक बार 
अगणित नारियल तोड़ 
नारियल पानी वाले 
कितने प्यासे राहियों को 
अमृतपान कराते हैं। 
किन्तु वह वृक्ष 
तनिक भी तो कुम्हलाते नहीं ?

उनकी ओर से हवा में 
वही सुगंध 
हर दिन क्यों बिखरती है ?
क्या वे दर्द में हैं ,
अपने फल देकर ?
लगते तो खुश हैं न ?
झूमते नाचते 
रोज़ प्रसन्नता बिखेरते हैं न ?

और एक याद है मन में 
गए थे हम 
अपार्टमेंट्स में फ्लैट खरीदने
सस्ता था उस समय के अनुपात से 
सोचा यह सस्ता है - घर ले लेते हैं। 
गए वहाँ देखने 
पीछे की खिड़की से 
सुनाई दिया अजीब सा कोलाहल 
उस तरफ जाने लगी तो 
एजेंट ने रोका - अजी उधर तो 
"वियु" नहीं है, ना "एलिवेशन" ही 
फिर भी गयी 
दरवाजा खोला तो 
अजब सड़ांध आयी 
और चीखती आवाज़ें 
पूछ ताछ की 
पता चला उधर कत्लखाना है 
पास के बाज़ार में मांस 
ऊंचे दामों बिकता है। 

इसीलिए इस जगह पर 
फ्लैट बिकते नहीं। 
लोग आना नहीं चाहते, 
ना ही किराया अच्छा मिलेगा 

सोचने लगी मैं। 

कहाँ वह नारियल के पेड़ 
और उनसे बरसती सुख शान्ति 
मिलता पीने को अमृत 
सांस लेने को अमृत 
और यहाँ यह ……

क्या सचमुच एक से ही हैं 
मांसाहार और शाकाहार ?

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

जीवन-दात्री

इसलिये नहीँ कि हिन्दू
मुस्लिम ।।।
इसलिये कि रूबी और
रेहाना की माँ को जब
दूध
नहीँ उतरा तो हमारी गौरी
ने भर भर माता का दूध दिया
पल गयीं।

मुफ्त में गाँव
की धेवती मानकर।

तो
धाय माँ दूध
माँ की हत्या ग़ुनाह है।
जब माँ नहीँ तो दुधारू
गाय भैंस
बकरी ही माँ होती है ।
एक बेटे का फर्ज है
जिसका दूध
पिया उसकी जान
बचाये ।
जबकि पश्चिमी यूपी।
सहित तमाम भारतीय ग्रामीणों का ।
खेती के बाद दूसरा रोजगार दूध घी दही है
तब गौ भैंस बकरी पालन को बढ़ावा देना चाहिये
और दुधारू पशु वध बंद होने चाहिये
ये
न मजहब है न जाति न
राजनीति
दुधारू गाय भैंस
बकरी ऊँटनी भेङ ।
बचे
तो
कुपोषण भारत छोङेगा
विज्ञापनों में
आमिर के चीखने से कुपोषण नहीं हटेगा ।
एक गाय भैंस
बीस साल तक परिवार को आधा आहार और पूरा रोजगार देती है ।
जबकि मार कर खाने पर केवल पाँच लोगो का एक दिन का चटोरापन
तो
बीस साल तक परिवार पालना ज्यादा जरूरी है
दुधारू पशु वध बंद कीजिये
--सुधा राजे

(सत्य घटना से प्रेरित, 'गौरी' सुधा राजे जी की गाय और रूबी रेहाना पङौस की बच्चियाँ है।) 

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

अमृतपान - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

हमारे पूर्वजों के चलाये
हजारों पर्व और त्यौहार
पूरे नहीं पड़ते
तेजस्वी, दाता, द्युतिवान
उत्सवप्रिय देवों को
जभी तो वे नाचते गाते
गुनगुनाते
शामिल होते हैं
लोसार, ओली व खमोरो ही नहीं
हैलोवीन और क्रिसमस में भी
लेकिन मुझे यकीन है कि
बकरीद हो या दसाइन
बेज़ुबान प्राणियों की
कुर्बानी, बलि या हत्या में
उनकी उपस्थिति नहीं
स्वीकृति भी नहीं होती
मृतभोजी नहीं हो सकते वे
जो अमृतपान पर जीते हैं

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

शाकाहार सम्बन्धी कुछ भ्रम और उनका निवारण -2

आज कई मांसाहार प्रचारक अपने निहित स्वार्थों, व्यवसायिक हितों, या धार्मिक कुरीतियों के वशीभूत होकर अपना योजनाबद्ध षड्यंत्र चला रहे हैं। वस्तुतः अब कुसंस्कृतियाँ सामिष आहार प्रचार के माध्यम से ही विकार पैर पसारने को तत्पर है। इस प्रचार में,  न केवल विज्ञान के नाम पर भ्रामक और आधी-अधूरी जानकारियाँ दी जा रही हैं, बल्कि इस उद्देश्य से धर्मग्रंथों की अधार्मिक व्याख्यायें प्रचार माध्यमों द्वारा फैलाई जा रही हैं। यह सब हमारी अहिंसक और सहिष्णु संस्कृति को दूषित  और विकार युक्त करने का कुटिल प्रयोजन है।

ऐसे ही 7 भ्रमों  का निवारण  निरामिष पर पहले प्रस्तुत  किया गया था, अब प्रस्तुत है भ्रम-निवारण 8 से 12……  

भ्रम # 8 अहिंसावादी, जीवदयावादी व शाकाहारियों के प्रभाव से भारतीय जनमानस कमजोर और कायर हो गया था।

उत्तर : मध्यकालीन आक्रांता तो धर्म-कर्म-जात आदि से केवल और केवल आक्रमणकारी ही थे, उनकी कोई नैतिक युद्धनीति नहीं थी। उनका सिद्धांत मात्र बर्बरता ही था। उनका सामना करने की जिम्मेदारी अहिसावाद,जीवदया या करूणा से प्रभावित लोगों की नहीं, बल्कि मांसाहारी राजपूत सामंतो व क्षत्रिय योद्धाओं की थी। जब वे भी सामना न कर पाए तो अहिंसावादी, जीवदयावादीयों को जिम्मेदार ठहराना हिंसावादियों की कायरता छुपाने का उपक्रम है। शौर्य और वीरता कभी भी मांसाहार से नहीं उपजती। न वीरता प्रतिहिंसा से प्रबल बनती है। वीरता तो मात्र दृढ़ मनोबल और साहस से ही पैदा होती है। इतिहास में एक भी प्रसंग नहीं है जब कोई यौद्धा अहिंसा को बहाना बना पिछे हटा हो। यथार्थ तो यह है कि युद्ध-धर्म तो दयावान और करूणावंत भी पूरे उत्तरदायित्व से निभा सकता है। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आक्रमण और पराजय का खेल केवल भारत में नहीं खेला गया है। सारी दुनिया में कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि वह सदा अजेय रही है। क्या वे सभी जातियाँ शाकाहारी थीं? गुलामी और हार का सम्बन्ध, शाकाहार या अहिंसा से जोड़ने का आपका यह प्रयास आधारहीन है। इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ सौ साल की गुलामी से पहले भारत में हज़ारों साल की स्वतंत्र,सभ्य और उन्नत संस्कृति का इतिहास भी रहा है।

इसलिए यदि 'धर्म' के परिपेक्ष्य चिंतन करें तो उसमें हिंसा और हिंसा के प्रोत्साहक माँसाहार का अस्तित्व भला कैसे हो सकता है। पशुहत्या का आधार मानव की कायर मानसिकता है, जब शौर्य व मनोबल क्षीण होता है तो क्रूर-कायर मनुष्य, दुस्साहस व धौंस दर्शाने के लिए पशुहिंसा व मांसाहार का आसरा लेता है। लेकिन पशुहिंसा से क्रूरता व कायरता को छुपने का कोई आश्रय नहीं मिलता। निर्बल निरीह पशु पर अत्याचार को भला कौन बहादुरी मानेगा। इसीलिए क्रूरता से कायरता छुपाने के प्रयत्न सदैव विफल ही होते है।

यह लेख दृष्टव्य है - "जहाँ निष्ठुरता आवश्यक है……………"


भ्रम # 9 सुरक्षा के लिए भी रक्तपात आवश्यक है।

उत्तर : रक्तपात सुरक्षा की गारंटी नहीं है। रक्तपात तो आपस में ही लड़ मरने की, वही आदिम-जंगली शैली है। रक्तपात को कभी भी शान्ति स्थापक समाधान नहीं माना गया। हिंसा कभी भी, किसी भी समस्या का स्थाई हल नहीं होती और न हो सकती है। चिरस्थाई हल हमेशा चिंतन, मनन, मंथन और समझोतों से ही उपजते हैं।

भ्रम # 10 मांसाहार एक आहार विकल्प है, शाकाहार या मांसाहार जिसकी जो मर्जी हो खाए।

नहीं!, मांसाहार आहार का विकल्प नहीं है। वह मात्र एक मसाला सामग्री की तरह स्वाद विकल्प मात्र है। पोषण उद्देश्य के लिए तो शाकाहार अपने आप में सम्पूर्ण है। मनुष्य शाकाहार के विकल्प के रूप में मांसाहार का प्रयोग नहीं करता। क्योंकि मात्र मांसाहार को वह अपना सम्पूर्ण आहार नहीं बना सकता, उसके लिए भी मांसाहार के साथ शाकाहार सामग्री का प्रयोग अनिवार्यता है। केवल मांस खाकर इन्सान जिन्दा नहीं रह सकता। इस लिए विकल्प की तरह चुनाव की बात करना मतिभ्रम है। स्वादलोलुपता की धूर्तता के कारण इसे विकल्प की तरह पेश किया जाता है। वस्तुतः मांसाहार आहार में आया एक विकार है। किसी जीव ने अपने जिन्दा रहने के लिए शाकाहार करके अपने शरीर की मांस मज्जा बनाई और आप उसके अपने जीवन भर के श्रम के अर्जन को निर्दयता से छीन कर अपना पेट भरें वह भी उसकी जिन्दगी ही लेकर? इस मर्जी को क्या कहेंगे।

कोई कैसे मनमर्जी खा सकता है मामला जब क्रूरता या असंवेदनशीलता का हो? अहिंसा प्राणीमात्र के लिए शान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। स्पष्ट है कि किसी भी जीव को हानि पहुँचाना, किसी प्राणी को कष्ट देना अनैतिक है। जीवदया का मार्ग सात्विक आहार से प्रशस्त होता है। इसीलिए अहिंसा भाव का प्रारंभ भी आहार से ही होता है और हम अपना आहार निर्वध्य रखते हुए सात्विक निर्दोष आहार की ओर बढते हैं तभी हमारे जीवन में संवेदनशीलता और अन्तः सात्विकता प्रगाढ होती है। नशीले पदार्थ का भोग व्यक्ति की अपनी मर्जी होने के बाद भी सभ्य समाज उसे सही नहीं ठहराता उसी तरह चुनाव की आजादी के उपरांत भी हिंसा को सही ठहराने वाले लोग मांसाहारियों में भी कम ही मिलते हैं।

दृष्टव्य: भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है।
दृष्टव्य: मानव के भोजन का उद्देश्य

भ्रम # 11 दुनिया भर में मांसाहार को लेकर कोई अपराधबोध नहीं है?

यह सही नहीं है कि लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है। हम एक बहु-विविध विश्व में रहते हैं। अमेरिकी घोड़ा खाना पाप समझते हैं, जापानी साँप खाने को हद दर्ज़े का जंगलीपन मानते हैं, भारतीय मांसाहारी गाय को अवध्य मानते रहे हैं जबकि मुसलमान सुअर नहीं खाते। मतलब यह कि मांसाहार लगभग हर भौगोलिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक प्रकार के अपराधबोधों से ग्रस्त है। और कुछ नहीं तो हलाल-झटका-कुत्ता का ग्लानी भरा झंझट तो व्याप्त है ही। यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे प्रत्येक देश विदेशों में कम ही सही पर कुछ लोग न केवल शाकाहार का समर्थन करते हैं बल्कि वे उसे ही बेहतर मानते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऐसा वे किसी भारतीय के कहने पर नहीं करते। विख्यात 'द वेजेटेरियन सोसायटी' अस्तित्व में आयी है, बेल्जियम के गेंट नगर ने सप्ताह में एक दिन शाकाहार करने का प्रण लिया है। ब्रिटेन व अमेरिका के अनेक ख्यातनाम व्यक्तित्व न केवल शाकाहारी हैं बल्कि पेटा आदि संगठनों के साथ जुड़कर पूरे दमखम से शाकाहार और करुणा का प्रचार-प्रसार करने में लगे हैं। वीगनिज़्म का जन्म ही भारत के बाहर हुआ है। इथियोपिया से चलकर विश्व में फैले ‘रस्ताफेरियन’ पूर्ण शाकाहारी होते हैं। भारी संख्या में 'सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट' भी शाकाहारी हैं।

भ्रम # 12 यह जरूरी नहीं है कि सभी मांसाहारी क्रूर प्रकृति के ही हो।

मांसाहार में कोमल भावनाओं के नष्ट होने की संभावनाएं अत्यधिक ही होती है। हर भोजन के साथ उसके उत्पादन और स्रोत पर चिंतन हो जाना स्वभाविक है। हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न माँस, हिंसक विचारों को जन्म देता है। ऐसे विचारों का बार बार चिंतवन, अन्ततः परपीड़ा की सम्वेदनाओं को निष्ठुर बना देता है। हिंसक दृश्य, निष्ठुर सोच और परपीड़ा को सहज मानने की मनोवृति हमारी मानसिकता पर दुष्प्रभाव डालती है। ऐसा दुष्प्रभाव यदि सम्भावनाएँ मात्र भी हो, तब बुद्धिमानी यह है कि सम्भावनाओं को अवसर ही क्यों दिया जाय। वस्तुतः कार्य गैर जरूरी हो और दुष्परिणाम की सम्भावनाएं भले एक प्रतिशत भी हो घटने के पर ही लगाम लगा दी जाय। विवेकवान व्यक्ति परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं पर पूर्णविराम लगाने का उद्यम करता है।

मनुष्य के हृदय में सहिष्णुता का भाव परिपूर्णता से स्थापित नहीं हो सकता जब तक उसमें निरीह जीवों पर हिंसा कर मांसाहार करने का जंगली संस्कार विद्यमान हो। जब मात्र स्वाद और पेट्पूर्ती के उद्देश्य से मांसाहार का चुनाव किया जाता है तब ऐसी प्राणी हत्या, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करती है जो निश्चित ही हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना, आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा, आतंक और अपराधों का मुख्य कारण है। हिंसा के प्रति जगुप्सा के अभाव में अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं बन सकती। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है और यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सहिष्णु बनाए रखती है।

दृष्टव्य: दिलों में दया भाव का संरक्षक शाकाहार

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

निरामिष विशेष कड़ियाँ (लिंक्स)

निरामिष पर अब तक प्रकाशित लेखों में विशिष्ठ आलेखों की विषयवार कड़ियाँ (लिंक्स)


  • अहिंसक मनोवृति (जीवदया और करूणा  के लिए शाकाहार)
  1. दिलों में दया भाव का संरक्षक शाकाहार।
  2. विश्व शान्ति का उपाय शाकाहार।
  3. हिंसा का अल्पीकरण ही अहिंसा का सोपान।
  4. आहार का अक्रूर आयाम है शाकाहार।

  • संतुलित पोषण स्रोत (पोषणयुक्त शाकाहार)
  1. प्राकृतिक पोषण मूल्यों का प्राथमिक स्रोत,शाकाहार ।
  2. संतुलित पोषण तत्वो का प्रमुख आधार है शाकाहार।
  3. केवल शाकाहार में है पोषण का पूर्ण संतुलन।
  4. शारिरिक प्रतिरक्षा प्रणाली का बल है शाकाहार।

  • आरोग्य वर्धक ( निरामय और स्वास्थ्यप्रद शाकाहार)
  1. स्वस्थ व दीर्घ जीवन का आधार है शाकाहार।
  2. आरोग्य संवर्धक है शाकाहार।
  3. विश्व स्वास्थ्य शाकाहार में निहित है।

  • सभ्य-खाद्याचार (सुसंस्कृत सभ्य आहार)
  1. आदिमयुग से विकास और सभ्यता की धरोहर है शाकाहार।
  2. शाकाहारी संस्कृति का संरक्षण ही हमारी सुरक्षा है।
  3. मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है शाकाहार।

  • पर्यावरण संरक्षण (प्राकृतिक संसाधनों के संयमित उपभोग हेतु शाकाहार)
  1. पर्यावरण का श्रेष्ठ उपचार है शाकाहार।
  2. प्राकृतिक संसाधनो का उपभोग संयम अर्थात् शाकाहार।
  3. अपरिहार्य हिंसा का भी अल्पीकरण है शाकाहार।
  4. विश्व भूखमरी का निदान है शाकाहार।

  • तर्कसंगत-विकल्प (पूर्णरूपेण तर्कसंगत और न्यायसंगत शाकाहार)
  1. प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था।
  2. मनुष्य की सहज वृति और उसकी कायिक प्रकृति दोनो ही शाकाहारी है।
  3. मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल।
  4. शाक से अभावग्रस्त, दुर्गम क्षेत्रवासी मानवो का अनुकरण मूर्खता!!
  5. सभ्यता व विकास मार्ग का अनुगमन या भीड़ का अंधानुकरण?
  6. यदि अखिल विश्व भी शाकाहारी हो जाय, सुलभ होगा अनाज!!
  7. भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस-उद्योग!!
  8. शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!!
  9. प्राणी से पादप : हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है।
  10. प्रोटीन प्रलोभन का भ्रमित दुष्प्रचार।
 11.  विटामिन्स का दुष्प्रचार।
 12. उर्ज़ा व शक्ति का दुष्प्रचार


निरामिष के बारे में आपका दृष्टिकोण कृपया यहां रखें.....

रविवार, 30 जून 2013

निरामिष आंदोलन

निरामिष-आहार, निर्मल-विचार, निर्दोष-आचार, निरवध्य-कर्म, निरावेश-मानस।

अहिंसा जीवन का आधार है, सहजीवन का सार है और जगत के सुख और शान्ति का एक मात्र उपाय है। अहिंसा के कोमल और उत्कृष्ट भाव में समस्त जीवों के प्रति अनुकम्पा और दया छिपी है। अहिंसा प्राणीमात्र के लिए शान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। स्पष्ट है कि किसी भी जीव को हानि पहुँचाना, किसी प्राणी को कष्ट देना अनैतिक है। यूँ तो सभी धार्मिक सामाजिक परम्पराओं में जीवन का आदर है परंतु "अहिंसा परमो धर्मः" का उद्गार भारतीय संस्कृति की एकमेव अभिन्न विशेषता है। अपौरुषेय वचन के तानेबाने अहिंसा, प्रेम, करुणा और नैतिकता के मूल आधार पर ही बुने गये हैं।

चूँकि आहार जीवन की एक मुख्य आवश्यकता है, इसलिये अहिंसा भाव का प्रारंभ आहार से ही होता है और हम अपना आहार निर्वध्य रखते हुए सात्विक निर्दोष आहार की ओर बढते हैं तो हमारे जीवन में सात्विकता प्रगाढ होती है। इसीलिये "निरामिष" आहार पर हमारा विशेष आग्रह है। जीवदया का मार्ग सात्विक आहार से प्रशस्त होता है। ज्ञातव्य है कि कुछ लोगों के लिये भोजन भी एक अति-सम्वेदनशील विषय है यद्यपि सभ्य समाज में हिंसा को सही ठहराने वाले लोग मांसाहारियों में भी कम ही मिलते हैं। सिख, बौद्ध, हिन्दू, जैन समुदाय में तो शाकाहार सामान्य ही है परंतु इनके बाहर भी कितने ही ईसाई, पारसी और मुसलमान शुद्ध शाकाहारी हैं जो जानते बूझते किसी प्राणी को दुख नहीं देना चाहते हैं, स्वाद के लिये हत्या का तो सवाल ही नहीं उठता। इस प्रकार हम देखते हैं कि अहिंसा जैसे दैवी गुण धर्म, क्षेत्र, रंग, जाति भेद आदि के बन्धनों से कहीं ऊपर हैं। जब यह कोमल भाव हमारे अन्तर में दृढभूत हो जाते हैं तब मानव की मानव के प्रति हिंसा भी रुकती है जो कि आज संसार भर में एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है।

आज कई मांसाहार प्रचारक अपने निहित स्वार्थों, व्यवसायिक हितों, या धार्मिक कुरीतियों के वशीभूत होकर अपना योजनाबद्ध षड्यंत्र चला रहे हैं। वस्तुतः कुसंस्कृतियाँ सामिष आहार के माध्यम से ही आक्रमण करने को तत्पर है। न केवल विज्ञान के नाम पर भ्रामक और आधी-अधूरी जानकारियाँ दी जा रही हैं, बल्कि अक्सर धर्मग्रंथों की अधार्मिक व्याख्यायें भी इस उद्देश्य के लिये प्रचार माध्यमों से फैलाई जा रही हैं। यह सब हमारी अहिंसक संस्कृति को दूषित कर पतित बनाने का प्रयोजन है। ऐसे सामिष प्रचारी 'हर आहार के प्रति सौहार्द', 'आहार चुनाव की स्वतंत्रता', व 'आवेश उत्थान शक्ति' आदि भ्रांत तर्कों के माध्यम से प्रभावित करते नज़र आते है। हमारी नवपीढी सामिष दुष्प्रचार की शिकार हो रही है। कहीं अधिक पोषण का झांसा दिया जा रहा है तो कहीं स्वास्थ्य का, कही खाद्य अभाव का रोना रोया जाता है और कभी स्टेटस सिंबल का प्रलोभन। जबकि उसके पीछे सच्चाई का अंश भी नहीं है।

‘निरामिष’ सामुदयिक ब्लॉग एक जागृति अभियान है, एक दयावान, करूणावान ‘निरामिष समाज’ के निर्माण का। हमारा मुख्य प्रयोजन, जगत में शान्ति के उद्देश्य से अहिंसा भाव के प्रसार का है। मनुष्य के हृदय में अहिंसा भाव परिपूर्णता से स्थापित नहीं हो सकता जब तक उसमें निरीह जीवों पर हिंसा कर मांसाहार करने का जंगली संस्कार विद्यमान हो। शाकाहार समर्थन के लिए लोकहित में यहां तथ्यपूर्ण और वस्तुनिष्ठ लेख उपलब्ध होंगे। हमारी निष्ठा सत्य और अहिंसा के प्रति है। हमारा प्रयत्न यहाँ पर अहिंसा और जीवदया के उस गौरव को पुनर्स्थापित करना है जो सदा से भारतीय संस्कृति की आधारशिला रहा है। "निरामिष" पर उपलब्ध सभी सामग्री न केवल श्रमसाध्य है बल्कि हमारी विशेष निष्ठा इस बात पर है कि यहाँ केवल विश्वसनीय सामग्री ही उपलब्ध हो।

यह एक गैरलाभ सेवा-कार्य है, ‘निरामिष’ के समर्थक बनकर सहयोग प्रदान करें। निरामिष समाज की रचना में योगदान दें। सात्विक आहार से स्वस्थ समाज के निर्माण में यह छोटा सा विनम्र प्रयास है।

सात्विक-आहार, स्वस्थ-आरोग्य, सौम्य-विचार, सुरूचि-व्यवहार, सद्चरित्र

सोमवार, 27 मई 2013

मनुस्मृति और मांसाहार

मनुस्मृति और मांसाहार (अध्याय पञ्चम अनुशीलन एंवम् समीक्षा)---

मांसाहार पर मनुस्मृति का पक्ष

मनुस्मृति पञ्चम अध्याय के प्रथम चारो मंत्र प्रक्षिप्त है(1 से 4 तक)

1- इन चारो मत्रोँ मे ऋषि लोग भृगु से प्रश्न कर रहेँ है।
2- ये चारो मंत्र अध्याय के विषय तालमेल नही रखते है।
3- इन चारो श्लोको मे प्रदर्शित प्रश्न और उत्तर मे भी परस्पर कोई संगति नही है। जैसे द्वितीय मंत्र मे प्रश्न है कि "स्वधर्म यानी वेदशास्त्रो के वेत्ता देवताओँ को मुत्यु कैसे मारती है" उत्तर है- वेदोँ के अनाभ्यास से, आचार के त्याग से, आलस्य से, अब आप खुद देखे कि एक तरफ तो प्रश्न में वेदवेत्ता शब्द है फिर उत्तर मे अनाभ्यासी, भला ये दोनो एक साथ संभव है क्या?

मनुस्मृति पञ्चम अध्याय मे आगे मंत्र 6-7 प्रक्षिप्त है क्योँकि 7वेँ मंत्र मे मांसाहार का वर्णन है और 6वाँ उसी से सम्बद्ध है। मंत्र 11 से 23 तक सभी प्रक्षिप्त है-

1- सभी प्रकार का मांसभक्षण और यज्ञोँ मेँ मांस डालना मनु की मान्यता के विरूद्ध है जैसा ये श्लोक बखान कर रहेँ हैँ।
2- ये श्लोक पूर्वापर प्रसंगविरूद्ध हैँ और प्रंसग भंग कर रहे हैँ। 10वेँ मंत्र मे दही और दही से बने पदार्थो के खाने का विधान किया है और 24वेँ मे घृत और घृतनिर्मित पदार्थो के भक्षण का विधान है। बीच मे मांसभक्षण सम्बन्धी वर्णन ने उस प्रसंग को भंग कर दिया है। अब हम सबसे महत्वपूर्ण मत्रोँ की ओर आतेँ है क्योँकि इन मंत्रो लेकर कोई जाकिर नाईक आर्यधर्म पर मांसभक्षण का आरोप लगाता है।

मंत्र 26 से लेके 44 तक प्रक्षिप्त है---

1- सभी प्रकार के मांसभक्षण की मान्यता और पशुयज्ञ का विधान सर्वथा मनु की मान्यता के विरूद्ध है।
2- मंत्र 24-25 मे मांस आदि से रहित अनिन्दित भोजन करने का कथन है, तदनुसार 45,46 वा 51वेँ मंत्र मेँ मांस का भोजन निन्दित है और किस प्रकार निन्दित है यह वर्णित है बीच मे मांसाहार का वर्णन प्रसंग भंग करता है। अत: ये मंत्र प्रसंगविरूद्ध प्रक्षेप है।

50वां मंत्र पुन: प्रक्षिप्त है क्योकिँ ये विधिपर्वूक मांसभक्षण की बात करता जबकि 51वेँ मंत्र मे मांस भक्षण से जुड़े हर व्यक्ति को पापी कहते है।

मंत्र 52 से 56 तक सभी प्रक्षिप्त है क्योँकि 52वां मंत्र विधिपूर्वक मांसभक्षण का विधायक है तो 56 वां सर्व प्रकार के मांसभक्षण का, जबकि मनु(5/51) मे मांसाहारी तो क्या उसमें सहयोगी को भी दोषी बतातेँ हैँ।

अब आगे इस अध्याय मे मंत्र 57 से 110 तक गृहस्थान्तर्गत देहशुद्धि विषय का वर्णन है। यहां मंत्र 58 से 104 तक प्रक्षिप्त है पुन: 108 भी शैलीविरूद्ध होने से प्रक्षिप्त है।

मंत्र 111 से 146 तक द्रव्य शुद्धि विषय मंत्र 113 वा 125वाँ प्रक्षिप्त है, फिर 127 से 145 तक सभी प्रक्षिप्त है। मंत्र 147 से 166 तक गृहस्थान्तर्गत पत्नीधर्म विषय मंत्र 147-148 प्रक्षिप्त है, फिर मंत्र 153 से 162 तक सभी प्रक्षिप्त है, मंत्र 164, 166 वा 168वां फिर प्रक्षिप्त हैँ।

पञ्चम अध्याय की समीक्षा- मित्रो, आश्चर्य की बात तो यह है कि मांसभक्षण कि सिद्धि के लिए प्रक्षेप करने वालोँ व्यक्तियोँ ने ऐसी अन्धता से प्रक्षेप किये हैँ कि उन्हे अपने पूर्वापर मत्रोँ का भी ध्यान नही रहा है, जिसके मन मे जैसा श्लोक आया बनाकर डाल दिया। मांसभक्षण की सिद्धि के लिए परलोक, पुण्य, यज्ञ, वेद, प्राचीन ऋषि सबकी आड़ ली। और अपनी बातोँ की सिद्धि के लिए जो युक्तियाँ दी है वे अत्यन्त छिछली, हास्यास्पद और स्वार्थपूर्ण है, जैसे यज्ञ के लिए मांस खाने वाले देवता है और शरीर के लिए खाने वाले राक्षस है। क्या अन्तर किया देवता और राक्षस का?

और प्रक्षेपोँ मे बच्चो जैसी बातेँ है जैसे 5/14,15 मे मछली खाना पूर्णत: निषिद्ध है तो 16वेँ में निमन्त्रण मेँ मछली खा लेने का विधान है।

मनु हर प्रकार से हिँसा के विरूद्ध है और कहते है कि दैनिक जीवनयापन के लिये उन कार्यो का चयन करे जिनमे हिँसा न हो(4/2)

मनु कहते है कि पशुओँ को चाबुक भी इस प्रकार मारोँ कि वो सन्तप्त न हो(4/68)

भला क्या ऐसे धर्मात्मा मांसभक्षण की आज्ञा दे सकतेँ है??

सोमवार, 6 मई 2013

विचार-- --नियति (सूक्ति)

अपने विचारों पर ध्यान दो, वे शब्द बन जाते हैं। अपने शब्दों पर ध्यान दो, वे क्रिया बन जाते हैं। अपनी क्रियाओं पर ध्यान दो, वे आदत बन जाती हैं। अपनी आदतों पर ध्यान दो, वे तुम्हारा चरित्र बनाती हैं। अपने चरित्र पर ध्यान दो, वह तुम्हारी नियति का निर्माण करता है। 

 --लाओ-त्जु

विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है, आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है और चरित्र से आपके प्रारब्ध की उत्पत्ति होती है। 
-- बौद्ध कहावत 

कर्म को बोओ और आदत की फसल काटो। आदत को बोओ और चरित्र की फसल काटो। चरित्र को बोकर भाग्य की फसल काटो। 
-- बोर्डमैन